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मंगलवार, मई 04, 2010

उपन्यास ‘को अहम्’ का कथा सूत्र

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यदि नर्मदा तट पर मुझे सदानंद नहीं मिलता तो संभवतः इस कथा का जन्म ही नहीं होता

सदानंद ने ही मुझसे कहा था-
‘‘नर्मदा का नदी होना या शिव पुत्री होना एक ही बात है क्योंकि नर्मदा जब शिव पुत्री है तो शिव का विस्तार है और नर्मदा जब नदी है तो शिवत्त्व का विस्तार है।’


           सदानंद का यह कथन वास्तव में श्रद्धा
और तर्क के बीच संतुलन स्थापित करता है लेकिन वही सदानंद अपने जीवन में श्रद्धा और तर्क के मध्य संतुलन स्थापित नहीं कर पाया। नर्मदा-तट पर बसे
अपने छोटे से नगर में जब उससे मिला तो उसकी अवस्था और स्थिति देखकर सहज ही उसकी ओर आकर्षित हुआ।


‘‘ युवा देह पर काषाय वस्त्र क्यों ?’’


मेरे इस प्रश्न  के उत्तर में उसने कई प्रश्न  मुझसे ही पूछे तो मैं समझ गया कि इस युवा मन के भीतर कितना संघर्ष है। सदानंद अपने प्रश्नों  के साथ कुछ दिनों तक मुझसे मिलता रहा और एक दिन अपने प्रश्नों  के साथ ही अपनी यात्रा पर आगे चला गया। मैं उसे नर्मदा पर लिखे अपने गीत सुनाता तो वो  बार-बार पूछता-‘‘ आप कहानी नहीं लिखते?’’


‘‘जब तुम्हें तुम्हारे प्रश्नों  के उत्तर मिल जाएंगे तब
मैं तुम्हारी कहानी लिखूंगा ।’’


सदानंद ही ‘को अहम्’ लिखने का कारण बना लेकिन सदानंद मुझे फिर कभी नहीं मिला। उसे उसके प्रश्नों  के उत्तर मिले या नहीं यह तो नहीं जानता लेकिन ‘को अहम्’ के अंतिम पृष्ठ पर मेरी मौन प्रार्थना भी जुड़ी हुई है जो सदा से यही चाहती है कि सदानंद को उसके प्रश्नों  के उत्तर मिल जायें।

                                                 
                        -अशोक जमनानी   
 
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