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बुधवार, मई 05, 2010

कविता -घोड़ा

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मेरा दो बरस का भांजा
शिवांश
मुझे घोड़ा समझता है
टिक्-टिक् कहता है
मेरी पीठ पर बैठ कर
पक्के यकीन के साथ
कि मैं घोड़ा ही हूं
मैं भी घुटने-हाथों केा
टेक देता हूं ज़मीन पर
थोपी और ओढ़ी हुई
पहचान से मुक्त होकर
हो जाता हूं शामिल
उसके इस यकीन में
कि मैं घोड़ा ही हूं
घुटने और हाथों को
ज़मीन पर टेकते ही
एक पल नहीं लगता
मुझे घोड़ा बनने में
और न जाने
कितनी सदियाँ बीतीं
शायद लाखों-करोड़ों वर्ष
मैं खड़ा हूं दो पांवों पर
लेकिन अब तक
इंसान नहीं बन पाया
                    - अशोक जमनानी

 
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