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शनिवार, मई 08, 2010

नई ग़ज़ल

  अब आंखें बंद कैसे मैं कर सकूं बताओ
तस्वीर देके तुम मुझे जगराते दे गए हो

कोई नहीं यहाँ पर फिर भी नहीं अकेला
याद आके मुझको महफिल में ले गए हो

आंखों में आंसू लेके हंसना नहीं है आसां
मुस्कराहटों में भी मेरी बनावट भर गए हो

स्याही सा बिखर जाऊं मैं किसी सफे पे
हर्फ़ हूं ग़ज़ल का तुम जिसे  कह गए हो

है मेरी रूह तुमसे कुछ इस तरह वाबस्ता
तुम दूर जाके भी तो मेरे पास रह गए हो

-अशोक जमनानी 
 
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