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सोमवार, मई 10, 2010

मदर्स-डे पर मेरे उपन्यास ‘बूढ़ी डायरी’ का एक अंश

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बाबूजी के चले जाने के बाद हवेली का मौन सहन
करना असम्भव हो गया था।
हमारी हवेली में उदासी का साम्राज्य स्थापित हो
गया और हमारे बीच भी मौन आकर ठहर गया।
        लेकिन हर बार की तरह तुमने एक दिन
मौन को हरा ही दिया।
        बस एक छोटी सी खबर
        धारा! तुम मां बनने वाली थीं।
हम भूल गए कि हमारे बीच से बहुत से लोग जा
चुके हैं। हमें तो इंतजार था किसी के आने का।
       धारा! जब मैंने तुम्हें पहली बार देखा था
तो तुम मुझे बहुत सुन्दर  लगी थीं।
       कितनी बार मुझे लगा कि तुम पहले से
अधिक सुंदर हो गयी हो।
       लेकिन तुम मुझे सबसे अधिक सुंदर उन
दिनों लगती थीं जब तुम मां बनने वाली थीं।
      धारा!
          मां सबसे सुंदर होती है न!

        
                             - अशोक जमनानी
 
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