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सोमवार, मई 17, 2010

लघु कथा -'' कुछ देर ''

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                                         धूप ऐसी कि लगे जैसे देह पांच के बजाय चार तत्त्व की ही रह जाएगी; जल तो मानो पूरा का पूरा ही उड़ चला था। पॉश  कॉलोनी  की व्यवस्थित पंक्ति में केवल एक घर ऐसा था जिसके बगीचे के एक पेड़ का फैलाव बाहर तक था। बहुत देर से छांव तलाश रहे भिखारी की करूण विनती ‘कुछ देर बस कुछ देर बैठने दो।’ ने दरबान के मन में दया जाग्रत की और उसने भिखारी को सुस्ताने की अनुमति दे दी। कुछ देर सुस्ताने के बाद भिखारी ने पोटली से रोटियां निकालीं और खाकर वहीं लेट गया। जब बहुत देर तक वो नहीं उठा तो दरबान ने पहले तो उसे आवाज़ दी फिर हिलाया-डुलाया मगर उसके तो प्राण पखेरू उड़ चुके थे। दरबान चिल्लाया; बंगले के मालिक ने बाहर आकर सारा मामला समझा फिर जितनी गालियां उन्हें आती थीं वो सब दरबान को सुना दीं।


                             दरबान चुपचाप सुनता रहा और मन ही मन तय करता रहा कि दया धर्म की ऐसी की तैसी; कुछ देर तो क्या अब तो किसी को एक पल भी वहां रुकने नहीं देगा। कुछ देर बाद पुलिस लाश  उठाकर ले गयी। मालिक के रसूख के कारण परेशानी नहीं हुई। दरबान ने सफाई शुरू की। कुछ रोटियां डिब्बे में  थीं; पॉश कॉलोनी  जिसके हर घर में कुत्ते हैं वहां सड़क पर कोई कुत्ता नहीं था। दरबान ने सोचा कुत्ता होता तो रोटियां फेंकनी नहीं पड़तीं। फिर उसने मरे हुए भिखारी को मन ही मन वही गालियां देना शुरू  किया जो मालिक ने उसे दी थीं। तभी उसकी नज़र भिखारी की पोटली पर पड़ी। पोटली उठायी तो कुछ नोट नज़र आए; तीव्रता से सफाई करके दरबान भीतर आया। नोट गिने तो हैरान रह गया; पूरे दो लाख रुपए।ये तो अच्छा हुआ कि पोटली बहुत गंदी है वरना पुलिस क्या छोड़ देती; दरबान ने सोचा और तुरंत तय कर लिया कि वो कल ही छुट्टी लेकर गांव चला जाएगा। फिर उसने मन ही मन वो सब गालियां अपने मालिक को दीं जो वो भिखारी को दे चुका था; आखिर दया धर्म भी कोई चीज़ है। बाहर आकर उसने डयूटी फिर शुरू  की तब भी दिन ढला नहीं था बहुत धूप अब भी बाकी थी; उसने सड़क पर दूर तक दृष्टि डाली; क्या पता वहां कोई भिखारी हो जो छांव में रुकना चाहता हो - कुछ देर।
                                       
 
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