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सोमवार, मई 24, 2010

पुष्प की अभिलाषा --तथ्यों की जानकारी



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चाह नहीं मैं ; सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं
चाह नहीं प्रेमी की माला बिंध प्यारी को ललचाऊं
चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊं
चाह नहीं देवों के सिर पर चढ़ूं भाग्य पर इठलाऊं

मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ में देना तुम फेंक !
मातृ भूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जायें वीर अनेक!

मुझे अपने स्कूल के दिनों से पं. माखन लाल चतुर्वेदी की यह रचना याद है। उन दिनों जो कविताएं मुझे बहुत अच्छी लगतीं थीं यह उनमें से एक है। बाद में जब मैंने पं. माखन लाल चतुर्वेदी जी का साहित्य पढ़ा तब मुझे इससे जुड़े कुछ तथ्यों की जानकारी मिली। पं. माखन लाल जी ने कर्मवीर नामक पत्रिका; जिसके की वे  संपादक थे; में रतौना के कसाईखाने के बारे में कुछ लेख लिखे जिसके कारण अंग्रेजी सरकार को वो कसाईखाना बंद करना पड़ा। इसी कारण पण्डित जी पर देश द्रोह का मुकद्मा चलाया गया और उन्हें जेल भेज दिया गया। 18 फरवरी 1922 को बिलासपुर जेल में उन्होंने यह कविता लिखी जो बाद में हिन्दी साहित्य का गौरव बनी। बाद में उनकी हस्त लिपि में लिखा इस कविता का चित्र भी संलग्न है आशा है आपको पसंद आयेगा।
                                                                                                                                - अशोक जमनानी

 
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