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शुक्रवार, जून 04, 2010

लघु कथा: लघु कथा




        आजकल पथिक जी की लघु-कथाओं की तूती बोल रही है। साहित्यिक बिरादरी की प्रशंसा और ईर्ष्या मिश्रित आलोचना भी मुखर है। पथिक जी की लेखनी और ज़बान दोनों ही धारदार हैं। कोई उनसे पूछता है कि कहानी या उपन्यास के क्षेत्र में कब आ रहे हैं तो बिफर पड़ते हैं। कहते हैं ‘‘लम्बी कहानी और उपन्यास लिखने वाले साहित्य के दुश्मन हैं। अरे ! जो बात आधे पन्ने में कही जा सकती है उसके लिए सैकड़ों पन्ने बर्बाद करने की क्या ज़रूरत है।’’ उनका मानना है कि उपन्यास और कहानी के विस्तार ने ही साहित्य का बंटाधार किया है। वो कहते हैं कि असल में कहानी बस आधे पन्ने की होती है बाकी सब तो लेखकों के दिमाग का कूड़ा-करकट होता है। उन्हें जिस शब्द से सबसे अधिक नफरत है वो है- विस्तार।

 पथिक जी उस दिन भी सुबह-सुबह लघु कथा लेखन में व्यस्त थे। उन्होंने तय कर लिया था कि कहानी को आठ पंक्तियों में पूरा करना है। चार पंक्तियां वो लिख चुके थे और शेष कहानी को चार पंक्तियों में पूरा करने के लिए दिमागी कसरत में व्यस्त ही थे कि कर्कशा पत्नी ने थैला पटकते हुए कहा कि अभी सब्जी नहीं लाए तो खाना भी मत मांगना। पथिक जी बड़े लेखक मगर आम पति ठहरे तुरंत थैला उठाया और अधूरी लघुकथा छोड़कर बाज़ार चल दिए। सब्जी मंडी में उनके लिए कई कहानियां बिखरी पड़ी थीं। उन्होंने कुछ गरीब सब्जी बेचने वाली औरतों के फटे कपड़ों से बाहर झांकते शरीर देखे; खरीददारों की मोल-भाव करते वक्त एक से एक नवीन दलीलें सुनीं; हिजड़ों को जबरन सब्जी उठाते और पुलिस वालों को ज़बरन वसूली करते देखा। एक मनोरंजक घटना भी घटित हो गयी। एक बकरी लौकी बेचने वाले की एक छोटी लौकी उठाकर भागी; वो उसके पीछे दौड़ा; जब तक वो लौटता तब तक तीन-चार गाएं मिलकर उसकी सारी लौकियां खा गयीं। पथिक जी भारी प्रसन्न थे कई लघु कथाओं के लिए मसाला मिल चुका था। फटाफट सब्जी खरीदी और वापस घर चल दिए। रास्ते में ही उन्हें सूचना मिली कि उनके इकलौते बेटे को पुलिस पकड़कर ले गयी है। पथिक जी लगभग दौड़ते हुए घर पंहुचे तो देखा कि पत्नी सिर पटक पटक कर रो रही है।


‘‘ मुन्ना को पुलिस क्यों ले गयी?’’ उनके पूछने पर पत्नी ने कहा ‘‘खून कर दिया।’’ 
‘‘क्यों?’’ 
‘‘लड़की का चक्कर ’’ पत्नी का जवाब सुनकर पथिक जी आग बबूला हो गए 
‘‘अरे बेवकूफ औरत! तीन शब्द के उत्तर क्यों दे रही है! पुलिस कचहरी का मामला है जब तक मुझे हर बात विस्तार से पता नहीं होगी तब तक कैसे कुछ कर पाऊंगा।’’
पथिक जी की पत्नी विस्तार से सारा मामला समझाने लगी। कहीं वो संक्षेप में कोई बात कहती तो पथिक जी कहते ‘‘विस्तार से बताओ! पूरे विस्तार से।’’
पथिक जी विस्तार के साथ बतायी जा रही पुत्र के कुकर्मो  की कहानी पूरे ध्यान के साथ सुन रहे थे और मेज़ पर रखा अधूरी लघु कथा का पन्ना तेज़ हवा के कारण मुक्त होने के लिए तेजी से फड़फड़ा रहा था।

                        - अशोक जमनानी
 
 
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