Loading...
मंगलवार, जून 08, 2010

ग़ज़ल: दरख़्त

Share


सूखे पत्तों को जब आकर हवा उड़ाती है
शाख के पत्तों की भी रूह कांप जाती है

दरख़्त अपने ही पत्तों का हो नहीं पाता
चिड़िया पागल है वहां घोंसला बनाती है

धूप पेड़ों के सिर जमाती जब डेरा आकर
ये छांव पेड़ों तले तब बस्तियां बसाती है

दरख़्त जो भी खास थे वो बन गये खुदा
आम लकड़ियां तो चूल्हों को ही जलातीं हैं

दरख़्त मिट्टी से रिश्ता समझ नहीं पाता
साथ रहती है फिर ये साथ छोड़ जाती है
- अशोक जमनानी
 
TOP