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शुक्रवार, सितंबर 24, 2010

विचार :-''नहीं अलहदा ''


         कल मेरे मित्र हृदयेश ने रात में फोन लगाकर कहा कि मैं छत पर जाकर प्रकृति का अद्भुत नज़ारा देखूं । कल गुरू और चंद्रमा बहुत पास-पास थे और आकाश में अद्भुत सौंदर्य की सृष्टि कर रहे थे। मैं देर रात तक उस दृश्य को निहारता रहा। हृदयेश ने ही मुझे बताया कि ये दोनों शुभ ग्रह एक ही राशि- मीन राशि में युति कर
रहे हैं इसी कारण देश में विवाद या अशांति  की संभावना नहीं है। हृदयेश का मानना है कि अयोध्या विवाद पर निर्णय भी इसी कारण टल गया। दो दिन बाद ये युति समाप्त हो जाएगी मैं सोचता हूँ कि तब क्या होगा। ज्योतिष पर मेरा बहुत सीमित विश्वास है लेकिन यदि ग्रहों कि कोई युति सचमुच देश की शांति का कारण बन सकती है तो मैं तो यही कामना करूंगा कि ये युति बनी रहे। लेकिन इस युति को बनाना हमारे लिए शायद संभव नहीं है पर एक युति तो है जो हम चाहे तो बहुत आसानी से बन सकती है और वो युति है हिन्दु-मुस्लिम की एकता की युति। यदि हमसे बहुत-बहुत दूर स्थित
ग्रह पास आकर शांति करवा सकते हैं तो फिर हम भी पास आकर शांति की स्थापना क्यों नहीं कर सकते। हृदयेश का कहना है कि ये शुभ ग्रह हैं इसलिए इनकी युति शुभ प्रभाव का सृजन कर रही है। मुझे लगता है कि शायद यही बात समाधान बन सकती है। हमारे
दिलों में भी शुभ का सृजन होगा और हम पास-पास आएंगे तो सारा का सारा अशुभ स्वयं ही दूर होकर शुभ का पथ प्रशस्त कर देगा। बहुत पहले दो शेर लिखे थे शायद
आज उन्हें दोहराना भी शुभ हो..........................

                चाहे अजान हो या हम आरती ही गाएं
               बोल हैं अलग पर सुर तो जुदा नहीं है
              
               तू बुत परस्त हो या अल्लाह का हो बंदा
               मेरे तो गीत और ग़ज़ल अलहदा नहीं हैं

                               - अशोक जमनानी        
 
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