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रविवार, अक्तूबर 24, 2010

दीपावली: दीप-प्रथम


गांव की मिट्टी के दीपक हैं
गांव की ही तो बाती है 
फिर क्यों ये जगमग रोशनियां 
गांवों तक पहुँच न पाती हैं
हम रुके बहुत अब चलें ज़रा
अब रात वहां ना काली हो
जो राजमार्ग पर ठहरी है 
वो गांव की भी दीवाली हो  

- अशोक जमनानी
 
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