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सोमवार, अक्तूबर 25, 2010

दीपावली: दीप-द्वितीय


रौशन खुशियों का आलम हो
घर मेरे घर तेरे भी
आंगन के दीपक से हारें 

 नभ के गहरे अंधेरे भी
इक आंगन के उजाले में
कहां बात निराली होती है
जब हर आंगन में दीप जलें 

 तब रात दीवाली होती है

- अशोक  जमनानी
 
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