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शुक्रवार, अक्तूबर 29, 2010

दीपावली: दीप-षष्ठ

 चिराग़

मुत्मइन  चिराग़ जो होते 
जलते हुए करते न सफ़र 
अंधेरों की खि़लाफ़त में यूं 
लड़ते रहते ना उम्र तलक

आहन को पिघलाने वाले
जिस्म में शोले भरे नहीं
लबों पे आग अगरचे तो
बात नहीं ये भी मामूली 
स्याह अंधेरों में वैसे तो
जुंबिश का मतलब होगा
झूठ हैं जब गुलपोश हुए
सच को तो जलना होगा 
आतशनफ़सी चिराग़ों की 
बेवज़ह नहीं होती होगी 
अगरचे जलती लड़ती है
मिट्टी में कोई असर होगा

  मुत्मइन चिराग़ जो होते
लड़ते हुए करते न सफ़र 
अंधेरों की खि़लाफ़त में यूं 
करते न बग़ावत उम्र तलक

- अशोक जमनानी 

 
.  मुत्मइन : संतुष्ट  
. आहन     : लोहा   
.आतशनफ़सी: जलती सांसें


 
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