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बुधवार, नवंबर 03, 2010

दीपावली: दीप-एकादश

दीप खिलखिलाएंगे 
शरारती बच्चों की तरह 
इस बार भी दीवाली पर 
जैसे बाग के आम-अमरूदों 
पर फेंककर पत्थर हैं भागते 
जैसे गेंद से तोड़ते कांच को 
फिर भागने की राह तलाशते 
जैसे स्कूल की छुट्टी होते ही 
बाहर निकलते हैं कूदते-फांदते 
वैसे ही गहरे अंधकार पर 
उछाल देंगे छोटी-सी रोशनी 
अमावस्या के स्याह कांच को तोड़कर 
चिढ़ाएंगे आसमान को मुंडेर पे बैठकर 
घरों से निकलकर आंगन में बैठेंगे 
तो कोई रोक न पायेगा हंगामे को 
दीप खिलखिलाएंगे 
शरारती बच्चों की तरह 
इस बार भी दीवाली पर 
और अमावस्या का काला आसमान 
जो चाँद-सूरज को देकर छुट्टी 
देख रहा था सपना 
निरंकुश सत्ता का  
सिर धुनेगा
इस बार भी दीवाली पर 
क्योंकि 
दीप खिलखिलाएंगे 
शरारती बच्चों की तरह 
इस बार भी दीवाली पर

- अशोक जमनानी 
 
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