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बुधवार, नवंबर 10, 2010

हिंदी दिवस से जुड़े अनुभव के बहाने एक बड़ी बात

दीपावली पर मां ने हर बार की तरह इस बार भी पुराने सिक्के निकाले, उन्हें साफ किया और पूजा के बाद फिर उसी बक्से में वापस रख दिया। मैं बरसों से यह प्रक्रिया देख रहा हूं लेकिन इस बार मुझे इस प्रक्रिया ने हिन्दी-दिवस में अपनी भूमिका की याद दिला दी। सरकारी विवशताओं के चलते शैक्षणिक संस्थानों और अन्य शासकीय कार्यालयों में 14 सितंबर को औपचारिकता से भरे कार्यकम हर बार आयोजित होते ही हैं। जैसे मेरी मां दीवाली पर सिक्के बाहर निकालती है वैसे ही हिन्दी के निरीह साहित्यकार अचानक महत्वपूर्ण हो जाते हैं और उन्हें भी सम्मान सहित बाहर निकलने का अवसर मिलता है और हिन्दी पखवाड़ा बीतते ही उन्हें फिर से साल भर के लिए विस्मृत कर दिया जाता है। खैर! छोड़िये ये भी क्या कम है कि कुछ दिन तो शाल-श्रीफल के साथ बीतते हैं। मुझे इस बार कई आमंत्रण मिले और मैं भी ना-ना करते तीन स्कूलों में तो चला ही गया। बेचारे बच्चे!!


बहुत विवशता के साथ मेरी ओर देख रहे थे। मैंने तीनों स्कूलों में दो सवाल पूछे; पहला सवाल था- क्या आपको भाषण सुनना पसंद है? बच्चों ने तुरंत कहा-नहीं! मेरा अगला सवाल था क्या आप भाषणों पर भरोसा करते हैं? बच्चों ने कहा- बिल्कुल नहीं! 

ये बात बिल्कुल सच है कि  हमारे देश में इतने अधिक और झूठे भाषण दिए जा चुके हैं कि ना तो कोई उन्हें सुनना चाहता है और ना ही कोई उन पर भरोसा करता है। फिर भी हम भाषण देते हैं और एक झूठा भ्रम पालते हैं कि लोग हमें सुन रहे हैं। हमारी नयी पीढ़ी हमसे शायद कुछ और अपेक्षा रखती है। वो उबाऊ भाषण नहीं चाहती उसे जानकारियों के बोझ तले पहले ही बहुत दबाया जा चुका है। विशेष अवसरों पर यदि हम उनके चेहरे पर मुस्कान ला सकें तो अपने बोझ से कुछ छुटकारा पाकर शायद वो अपनी स्वाभाविकता के साथ हमें स्वीकार कर पाएंगे और ना केवल हमारी बात सुनेंगें वरन् अपनी बात भी सामने रखेंगे जो कि कम महत्वपूर्ण नहीं होती।   निदा फ़ाज़ली साहब के कुछ मशहूर शेर याद आ रहे हैं।वो फरमाते हैं - 

जिन चिराग़ों को हवाओं का कोई खौफ़ नहीं
उन चिराग़ों को हवाओं से बचाया जाए

बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं
किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाए

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए 
                               .... निदा फ़ाज़ली साहब

 
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