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रविवार, नवंबर 21, 2010

ग़ज़ल - उड़ा हुआ रंग











दीवारों का उड़ा हुआ रंग कितना अच्छा लगता है
जब तुम पास नहीं होते तो अपने जैसा लगता है

कई दिनों के बाद रात भर नींद ही आयी याद नहीं
कभी कभी तन्हा रातों से मिलकर अच्छा लगता है

गिरता है घर लेकिन वो तो अब भी उसमें रहता है
बचपन का दरिया जैसे बूढ़े दिल में भी बहता है

खाली खाली नहीं है ये मेरा खाली ज़ेबों वाला घर
हर सिक्का आकर मेरे दिल के दर सज़दा करता है 

- अशोक जमनानी 
 
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