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सोमवार, मार्च 28, 2011

मिठास


        छपाक-छपाक लिखने के दौरान आदिवासी अंचलों की कई यात्राएं करने का अवसर मिला और उन यात्राओं के कई अनुभवों को कहानी में सम्मिलित भी कर लिया था लेकिन बहुत सारे अनुभव अब भी अछूते हैं। ऐसा ही एक अनुभव आदिवासियों के छोटे से मेले के दौरान हुआ। छोटे से मेले की छोटी-सी दुकान पर जब मैंने मिठाई खरीदनी चाही तो दुकानदार ने कहा-’’ रहने दो साहब आप खा नहीं पाओगे।‘‘ मैंने कारण पूछा तो उसने कहा कि मिठाई बहुत अधिक मीठी है और शहर के लोग इतना मीठा खा नहीं पाते। मैंने केवल अनुभव हासिल करने के लिए मिठाई खरीद कर मुंह में रखी तो समझ में गया कि मिठास के आधिक्य का क्या अर्थ होता है। जब आदिवासियों के जीवन का संघर्ष देखा था तो सोचता था कि वो जीवन की सारी कड़वाहट को कैसे सहन करते हैं लेकिन उस मेले में जाकर मैंने जाना कि एक ओर हमारा सुविधाभोगी समाज जीवन के संघर्ष की बहुत अधिक कड़वाहट सहन नहीं कर सकता है   दूसरी ओर सुविधाओं ने उससे मिठास का अतिरेक सहन करने की सामर्थ्य भी छीन ली है। 
लेकिन वो मिठास आज भी घुल रही है सारी की सारी मिठास के साथ लेकिन हमारी रसना पर नहीं बल्कि निर्दोष आदिवासियों की निर्दोष रसना पर।   
   


                  
 
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