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गुरुवार, मार्च 29, 2012

कविता:-आज रात


आज रात
जब मौसम बसंत छोड़ चुका
नींद बहुत देर से ही आएगी
आज रात
जब ख्वाबों का कोई वजूद नहीं
नींद बेवजह ही तो सुलायेगी    
आज रात
जब मैं थककर नहीं लौटा हूँ घर
नींद आएगी तो क्या पायेगी
आज रात
जब चिंता नहीं है कल की मुझे
नींद बेकार मेरी जाएगी 
आज रात
अपने अपने मयखाने में
जब मुल्क मुतमईन है
जब खल्क मुतमईन है
जब शाह मुतमईन है
जब आह मुतमईन है
कि नींद और रात ही
हक़ है असल में
तब मैं शायद पागल हूँ
जो सोचता हूँ इस तरह
कि नींद इस लिए सुलायेगी

क्योंकि उजली सुबह आएगी     

- अशोक जमनानी



मुतमईन --  संतुष्ट 
खल्क  ---   जनता 
 
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