Loading...
मंगलवार, अप्रैल 03, 2012

कविता-खबरें देखते वक़्त

खबरें देखते वक़्त
खबरिया चैनल पर
बेसब्री से करता हूँ
इंतज़ार - ब्रेक का
आवाज़ में भरकर
न जाने कितनी मिठास
सारा का सारा बाज़ार
बहलाता है फुसलाता है
जब पीता हूँ झूठ की  मिठास
तब लेता हूँ सुकून कि साँस
वरना तो ख़बरों के सांप
जिनमे भर देते हैं खबरनवीस
ज़हर कुछ अपना भी
डसते हैं मुझे
और न जाने क्या-क्या
तोड़ता है दम
मेरे भीतर
हाँ !
मैं बहुत अचरज के साथ
देखता हूँ उन्हे भी
जो देखते हैं
पूरी ख़बरें
और
उठकर चले जाते हैं
ब्रेक में !!!!!!!!!!!!!!
 
TOP