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मंगलवार, अप्रैल 24, 2012

एक सौ चार वर्षीय कला साधक अब्दुल रशीद खां साहब

कहते हैं नाद ब्रम्ह होता है और नाद का उपासक नाद्योगी . संभवतः इस नाद  योग का  ही चमत्कार है कि उसने एक सौ चार वर्षीय कला साधक अब्दुल रशीद खां साहब के गले में जो स्वर पिरोये हैं वो आयु के प्रभाव से न केवल पूर्णतया मुक्त हैं वरन श्रोताओं को किसी दैवीय अनुभव का एहसास कराने की भी सामर्थ्य रखते हैं. जहां एक  ओर उनकी देह आयु के प्रभाव से पूरी तरह अछूती नहीं रह पाई वहीँ कंठ का माधुर्य  आश्चर्यजनक रूप से पूर्ण निर्दोष है . ऐसे कला मनीषी के सानिद्ध्य में जो वक़्त बीता वो मेरे लिए सदैव अविस्मरणीय रहेगा कार्यक्रम के अंत में सधे हुए कंठ ने जब राम भजन का आरम्भ किया तो पूरे सभागार में जो अलौकिकता व्यापी वो भजन पूरा होने के बाद भी अपना असर दिखाती रही कार्यक्रम से कुछ देर पहले मैंने संभवतः  अपने अधिकारों का अतिक्रमण करते हुए उनसे अनायास  ही पूछ लिया था कि सरकार ने आपको अब तक पद्म अवार्ड से सम्मानित क्यों नहीं किया ? उन्होंने मुस्कराते हुए ऊपर की  ओर देखा ओर कहा कि मुझे उसने अवार्ड दिया है और जिसे वो अवार्ड मिल जाये फिर उसे सरकार के अवार्ड की जरुरत नहीं पड़ती. कार्यक्रम पूरा होने के बाद सभागार में मौजूद सभी लोग खड़े होकर लगातार दस मिनट तक  तालियाँ बजाकर उस कला मनीषी का अभिवादन करते रहे और मुझे भी समझ में आ गया कि जिसे सरकार अवार्ड दे और जिसे ऊपरवाला अवार्ड दे उनमे क्या फर्क होता है .
 
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