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मंगलवार, अगस्त 14, 2012

मेरी राजस्थान यात्रा-2(रामदेवरा)



राह में 

पोकरण से चले तो रामदेवरा जाने वाले रास्ते में लोगों की भीड़ तो थी ही मगर मंदिर से मीलों पहले  सड़क के किनारे श्रद्धालुओं के छोड़े हुए जूतें-चप्पल बरबस ही ध्यान आकर्षित कर रहे थे तपता हुआ सूरज सर पर था और मैं उन लोगों को देख कर आश्चर्य चकित था जो अपने जूतें-चप्पल उतारकर नंगे पाँव रामदेवरा की ओर बढ़ रहे थे अधिकांश लोग जूतों को राह में छोड़ना शुभ समझते हैं  . मैंने उनकी तपस्विनी श्रद्धा को प्रणाम किया और  उनके प्रति मेरी श्रद्धा तब और बढ़ गयी जब मुझे कुछ दूर नंगे पाँव चलना पड़ा . ज़मीन इतनी गर्म थी की दो कदम चलना भी मुश्किल था ऐसे में  जो लोग मीलों नंगे पाँव आये होंगे उनका समर्पण तो स्तुत्य ही था . लेकिन रामदेवरा पहुँच कर उन्ही लोगों का एक भिन्न रूप भी देखा जो लोग चप्पलें रास्ते में नहीं उतार पाए थे वो मंदिर के  सामने ही अपने जूते- चप्पल छोड़ कर जा रहे थे और उन्ही जूतों के साथ रामदेव पीर की तस्वीरें और उनकी पागलियाँ अंकित ध्वजाएं रास्ते और मंदिर प्रांगण में पड़ी हुई थी .

कुछ देर पहले जो ध्वजाएं भक्त जमीन पर भी नहीं रख सकते थे वो अब जूतों के साथ थी . भक्त और मंदिर प्रशासन दोनों के लिए जूतों और रामदेवरा की तस्वीरों का साथ होना बहुत सहज था. भक्तो के लिए जूतें छोड़ना महत्वपूर्ण था और मंदिर प्रशासन के लिए अतिरिक्त ध्वजाएं और तस्वीरें फिकवाना महत्वपूर्ण था. दोनों एक ही जगह फेंकी जा रही थी और मैं सोच रहा था कि जिस समाज को श्रद्धा इतना ऊँचा उठाती है उसी समाज को अविवेक कितना नीचे गिरा देता है . फिर हम तो हिन्दुस्तानी हैं हमें श्रद्धा आकर्षित नहीं करती वरन अंधश्रद्धा ही हमारा पाथेय है और हमने पाखंड को ही धर्म मान लिया है शायद इसीलिए हम जिसकी पूजा करते हैं उन्हें जूतें-चप्पलों के साथ रखते हुए हम ज़रा भी विचलित नहीं होते .

- अशोक जमनानी                      
 
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