Loading...
शुक्रवार, अगस्त 17, 2012

राजस्थान-यात्रा-५- सनावड़ा- २





खम्मा लेखन के लिए राजस्थान-यात्रा- सनावड़ा

जिस गाँव में सैकड़ों कलाकार रहते हो वहां किसी अनजान अतिथि के प्रति भी आत्मीय व्यवहार देखने को मिले तो बहुत आश्चर्य चकित नहीं होना चाहिए . संगीत में इतनी सामर्थ्य तो शेष है कि तेज़ी  से बदलते दौर में भी भारतीय मूल्यों को भारतीय जन-जन के मन में संजोकर रख सके . सनावड़ा में मुझे अपेक्षा से अधिक स्नेह मिल रहा था . गाँव के कच्चे घर जिन्हें झूपा कहते हैं मुझे बहुत आकर्षित कर रहे थे। मैंने बहुत संकोच के साथ वहां कुछ वक़्त बिताने की अनुमति मांगी तो बहुत प्रसन्नता के साथ उन्होंने झूपा मेरे लिए खाली कर दिया . मिट्टी की दीवारें और मिट्टी के चूल्हे के साथ मिट्टी की खुशुबू भी मुझे वहां रुकने के लिए विवश कर रही थी लेकिन मैं जल्दी ही वहां से आगे चल पड़ा . कच्चे घरों के साथ-साथ गाँव में पक्के घर भी बहुत थे। एक घर के बाहर कुछ महिलाएं गीत गा रहीं थीं। उनके स्वर में जो करूणा थी उसने मुझे वहां रुकने के लिए विवश कर दिया। वो घर किसी मांगणियार का ही था और गीत गा रही महिलाएं भी मांगणियार ही थीं जो दिल को छू लेने वाली एक परंपरा का निर्वाह कर रहीं थीं।  विवाह के बाद बेटी जब घर आती है और फिर लौटकर ससुराल जाती है तो घर और आस-पड़ोस  की महिलाएं उसके जाने के बाद घर के आँगन में बैठकर गीत गाती हैं कुरजां ,अरणी जैसे कई गीत हैं जो इस अवसर पर गाये जाते हैं ये लोक गीतों का मंचीय प्रदर्शन नहीं था ये लोक गीतों  का मूल स्वरुप था इसलिए मैं बहुत देर तक वो गीत सुनता रहा गाने वाली महिलाओं के चेहरे ढंके हुए थे पर उनके स्वर में जो करूणा थी जो पीर थी उस पीर उस करूणा का अदृश्य चेहरा  किसी को भी द्रवित कर सकता था . उन्होंने एक गीत गाया ..............
                              बाबेजी री कुरजों उड़ जासी
                             म्हरो वहतोड़ो बाद्लियो बरस जासी
                             आज म्हारी धीयल बाई सासरिये जासे
                            म्हरो वहतोड़ो  बाद्लियो बरस जासी 

बेटी को ससुराल जाना है कुरजों को उड़ जाना है और  रुके हुए बादल को बरस जाना है ये बादल और कुछ नहीं आँखों में रुके हुए आंसू ही तो हैं
                       घूंघट के पीछे उनके आंसू आँखों में थे या फिर वो बादल बरस गए थे ये तो मैं जान नहीं पाया पर उनके स्वर मैं बसी हुई पीड़ा मेरी आँखों से बरसने को आतुर हुई तो मैं वहां से चल पड़ा मैं भी उन बादलों को बाहर बरसने नहीं देना चाहता था। मैं चाहता था कि  वो भीतर बरस जाएँ ताकि संवेदना की नमी बनी रहे मुझमें भी और मेरी कहानी में  भी ..................

-अशोक जमनानी   
 
TOP