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शनिवार, अगस्त 18, 2012

राजस्थान- यात्रा-६-सनावड़ा-३





खम्मा लेखन हेतु राजस्थान यात्रा - सनावड़ा

मेरे नए उपन्यास का नायक मांगणियार है। इसीलिए उनके जीवन को करीब से देखने-समझने के लिए मैं राजस्थान गया था। लोक-गीत देश के हर हिस्से में गए जाते हैं लेकिन मांगणियार एक ऐसी जाति है जो लोक-गीतों का पर्याय बन चुकी है। संगीत इनके जीवन का आधार है। ये कलाकार मंचों पर तो कुछ ही समय से प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन संगीत से इनका रिश्ता सदियों पुराना है। अपने राजपूत यजमानों के यहाँ ख़ुशी के अवसर पर गीत गाना ही इनका पेशा है।  जब धर्म के नाम पर अलगाव का आलम हो तब ऐसे लोगों के बीच होना कितना सुकून पहुंचता है जो हमारी गंगा-जमुनी तहजीब के प्रतीक हों . मांगणियार इस्लाम को मानते हैं लेकिन किसी भी राजपूत के यहाँ ख़ुशी का कोई अवसर हो तो इनकी उपस्थिति अनिवार्य होती है जिन रस्मों में केवल परिवार के लोग होते है ये वहां भी मौजूद रहते हैं। और जब कभी इनके यहाँ ख़ुशी या गम का कोई मौका हो तो इनकी सारी जरूरतें हिन्दू राजपूत पूरी करते हैं। परस्पर रिश्ते का आलम ये है कि किसी हिन्दू यजमान के यहाँ किसी की मृत्यु हो जाये तो मुस्लिम मांगणियार के यहाँ शोक मनाया जाता है और इस दौरान वे रंगीन साफे के स्थान पर सफेद साफा बंधते हैं जो शोक का प्रतीक होता है। सनावड़ा एक ऐसा गाँव है जहां मांगणियारों के बहुत से घर हैं. मुझे एक घर में उनके गीत सुनने के लिए आमंत्रित किया गया संयोग से तीन पीढ़ियों के कलाकारों को एक साथ सुनने का मौका मिला। बुजुर्ग निहाल खां जवान होता मोहम्मद नवास और नन्हा याकूब खां। सबके संगीत में मिट्टी की अद्भुत महक और मिट्टी से अनमोल जुड़ाव। मैं बहुत देर तक उनके गीत सुनता रहा . ये किसी व्यवस्थित महफ़िल की दास्ताँ नहीं है कमरे में मेरे साथ दो बकरियां थीं बाहर कुछ गायें थीं और कुछ दूर एक ऊँट था। वो सब भी श्रोता थे बस एक ही फर्क था वो रोज़ सुनते हैं और मैं एक बार सुनने के बाद शायद ऐसी महफ़िल में फिर शामिल नहीं हो पाऊंगा ...... लेकिन मौका मिला तो मैं फिर जाऊंगा वहां जहां हर शख्स को ऐसी रूह मिली है जो इंसानियत के मायने समझाती है .    

- अशोक जमनानी             
 
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