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शुक्रवार, अगस्त 24, 2012

राजस्थान-यात्रा -11- गढ़ीसर-




खम्मा लेखन हेतु राजस्थान-यात्रा - गढ़ीसर

जैसलमेर के पीताभ पत्थरों की सोनारी आभा लिए कई इमारतें जैसलमेर में हैं. किले और हवेलियों से इतर कुछ ऐसी रचनाएँ भी हैं जिनसे जुड़ी कहानियां उतना ही सौन्दर्य बिखेरती हैं जितना सौन्दर्य उन इमारतों में हैं.ऐसा ही एक स्थान है - गढ़ीसर . नगर के मध्य में स्थित इस खूबसूरत सरोवर के घाट, मंदिर और सरोवर के मध्य में स्थित जल-महल बहुत आकर्षक हैं परन्तु एक रोचक कहानी सुनाता है टीलां का प्रोल. गढ़ीसर जिसका एक नाम घड़सीसर भी है का मुख्य द्वार टीलां का पोल कहलाता है. इस खूबसूरत द्वार का निर्माण एक वैश्या-टीलां ने करवाया था. निर्माण तक तो सब ठीक रहा लेकिन द्वार बनने के बाद  लोगों ने वहां के नरेश से कहा कि एक वैश्या के बनवाये द्वार से जनता और राज-परिवार कैसे निकलेगा ? उन्हें बात ठीक लगी और उन्होंने उसे तोड़ने के लिए सेना भेजी लेकिन जब तक वो वहां पहुँचती तब तक टीलां को खबर लग गयी और उसने तुरंत द्वार की ऊपरी मंजिल में भगवान की प्रतिमाओं की स्थापना कर दी. तोड़ने वाले मंदिर को कैसे तोड़ते बस वो द्वार बच गया जो आज भी ये कहानी सुनाता है तो समाज के दोमुंहेपन पर हँसता भी है क्योंकि वैश्या के पास जो धन था वो था तो उसी समाज का................ और हाँ, अब  भगवान वहां विराजे हैं ,जनता द्वार से आती-जाती है पर राजवंश आज भी उस द्वार का प्रयोग नहीं करता ...... सत्ता भगवान् और इंसान से अलग होती है न ...
- अशोक जमनानी 
      
 
 
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