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सोमवार, अगस्त 20, 2012

राजस्थान-यात्रा-९-जैसलमेर




राजस्थान-यात्रा-९-जैसलमेर
'सोनारी धरती जथे चांदी रो असमान' इस पंक्ति का अर्थ समझना हो तो जैसलमेर जाइये . पीताभ मिट्टी और पीताभ पत्थरों ने सचमुच इस धरती को सोनारी बना दिया है और सूरज ऐसा प्रखर हो चमकता है कि पूरा आसमान चांदी जैसा निर्दोष धवल हो उठता है. शायद इसी लिए जैसलमेर के किले का  सोनार नाम होना आरोपित नहीं लगता बल्कि सार्थक लगता है. फिर इस किले की दूसरी खासियत है - एक बड़ी आबादी की इसके भीतर बसाहट जो इसे जीवंत बनाकर लगभग किसी हैरीटेज-सिटी का सा वातावरण प्रदान करती है . हालांकि हर घर में  एक दुकान इसे हैरीटेज-मार्केट कहने के लिए भी आपको विवश कर सकती है . कुल मिलाकर अतीत और वर्तमान दोनों को एक साथ देखना कहीं ख़ुशी कहीं गम का मिलाजुला अहसास रहा . सबसे अधिक आनंद आया किले की सबसे ऊँची बुर्ज़ पर .वहां से पूरे शहर को निहारना एक अविस्मरणीय अनुभव रहा. हाँ,वहां पर एक तोप भी थी जिसका मुंह शहर की और था. बस एक कवि को जो चाहिए था वो मिल गया और एक कविता का जन्म हुआ . आप भी सुनिए ..........
     
             देखना किसी किले से
              देखना किसी महल से
              उसके क़दमों में बिछे शहर को

               जब किला या महल               
               देता है इज़ाज़त
               शहर को
              देखने की खुद को
              यह कहते हुए कि
              याद रखना मुझे
              उस दौर से

              इस दौर तक
              और याद रखना ये भी
              कि रक्खी हैं
              तोपें
               अब भी सबसे ऊँची बुर्ज़ पर
               जिसकी ज़द में है
               पूरा शहर
                इस छोर से
                उस छोर तक .

- अशोक जमनानी   


 
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