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शनिवार, सितंबर 22, 2012

राजस्थान-यात्रा -21-मण्डोर




राजस्थान-यात्रा -21-मण्डोर 

मैं जिन दिनों 'बूढी डायरी ' उपन्यास लिख रहा था उन दिनों बार-बार यही सोचा करता था कि काल का प्रवाह कितना शक्तिशाली है जिसने एक अति   समृद्ध प्राचीन नगरी त्रिपुरी का नामो-निशान मिटा दिया। त्रिपुरी पौराणिक नगरी होने के साथ-साथ कलचुरी राजवंश की राजधानी भी थी और बहुत लम्बे कालखंड तक  उसका भी वैभव बना रहा पर आज वो राजधानी अपना पूरा  अस्तित्व खो चुकी है और अब वहां एक छोटा सा गाँव है जिसकी जमीन कभी-कभी कुछ मूर्तियाँ उगल देती है तो त्रिपुरी का भूला-बिसरा वैभव फिर सांस लेने लगता है। मध्य-प्रदेश की इस दास्तान को जरा दूसरे ढंग से मैंने महसूस किया देश के ठेठ  पश्चिमी राजस्थान के मण्डोर  में। कहते हैं कभी यहाँ मांडव्य ऋषि का आश्रम था और तब इसका नाम   मांडव्यपुर था।   एक दूसरी  कहानी मय दानव की भी है जो रावण का ससुर था और इसी जगह पर रावण और मंदोदरी का विवाह भी हुआ था। खैर छोडिये कहानियां तो बहुत सी हैं और फिर अतीत का विस्तार भी चाहे  तो कहाँ से कहाँ तक ले जाए इसलिए जरा वर्तमान की बात करें और किस्से को पूरा करें। एक हरा-भरा क्षेत्र जो जोधपुर से 8-9 किलोमीटर दूर होगा बेहद खूबसूरत छतरियों के कारण शिल्प-प्रेमियों को बहुत देर तक रोके रखने की  सामर्थ्य रखता है।  अलंकृत स्तम्भ और दीवारें, तोरणों के खूबसूरत घुमाव, मंडप और शिखर ............. बस देखते रहिये और याद कीजिये उन अनाम कलाकारों को जो एक ऐसा खजाना छोड़ गए हैं जिन्हें सदियाँ बीतने पर भी काल का प्रवाह बहुत थोडा ही नुकसान पहुंचा पाया है। मण्डोर पहले ऋषि भूमि थी फिर राजधानी बनी। कई युद्ध इसने देखे फिर जोधपुर राजधानी बन गया तो मण्डोर हार-जीत के खेल से मुक्त हो गया। मण्डोर  से जोधपुर राजधानी ले जाने के पीछे एक कारण यह भी था कि मण्डोर बहुत दुर्गम नहीं था और अधिकांश लड़ाइयों में शत्रु सेना ने इस पर कब्ज़ा हासिल कर  लिया था। अब हारने वाली जगह कौन राजधानी बनाये रखना पसंद करता बस मेहरानगढ़ की नींव रखी  गयी और मण्डोर इतिहास बनता चला गया। एक ऋषि-भूमि युद्ध और संघर्ष से मुक्त हो गयी और हारी मगर उसे हरिनाम मिल गया अब वहां शान्ति का साम्राज्य है , शिल्प का सौंदर्य है, हरियाली है और पर्यटकों की भीड़ भी है यही भीड़ जोधपुर के मेहरानगढ़ किले में भी आती है लेकिन वहां की बहुत ऊँची दीवारों में राजसी गर्व उसे उतनी सहजता की इज़ाज़त नहीं देता जितनी  सहजता मण्डोर देता है। मेहरानगढ़ भी  क्या करे हुकम को शांति का फलाहार ही पसंद होता तो वो मण्डोर में ही न बस जाते ...... बेचारी दिल्ली वो भी अशांत और परेशान है क्या करे राजधानी जो  ठहरी .……

- अशोक जमनानी 
 
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