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मंगलवार, सितंबर 18, 2012

राजस्थान-यात्रा-१९-जोधपुर






खम्मा लेखन हेतु राजस्थान-यात्रा-जोधपुर

ऐतिहासिक इमारतों को छोड़ दिया जाये तो जोधपुर देश के दूसरे बड़े शहरों की तरह ही है। कहीं उजला कहीं गन्दला कहीं भागता हुआ, कहीं ठहरा हुआ। वैसे  जोधपुर राजस्थान के बड़े शहरों में शुमार है और पर्यटन के नक़्शे में एक चमकता हुआ सितारा भी है इसलिए नूर से वाबस्ता है। दिन भर अतीत का वैभव निहारने के बाद बाज़ार में चौहटे पर दूध पीते हुए मैंने दुकानदार से पूछा कि उसे इस शहर की कौन सी इमारत सबसे अधिक पसंद है तो उसने हँसते  हुए कहा " हुकम, मुझे तो अपनी दुकान सबसे ज्यादा पसंद है। जैसी भी है लेकिन अपनी तो है। महल-किले तो उनको हसीन लगेंगे जिनके वो हैं या फिर उनको अच्छे लगेंगे जो आपकी तरह दूर-दूर से इन्हें देखने आते हैं ... हम तो सैकड़ों लोगों को दूध पिलाते हैं लेकिन वहां चाय पीने की हिम्मत नहीं है जो कहने को अकाल के नाम पर गरीबों ने बनाया पर आज अच्छा खासा आदमी भी वहां खाना नहीं खा सकता.. इतना महंगा है ! " मैं समझ गया कि वो उम्मेद भवन पैलेस की बात कर रहा है। इस भव्य महल का निर्माण अकाल पीड़ितों को रोज़गार मुहैया करवाने के लिए किया गया था। लगभग सोलह वर्षों तक निर्माण कार्य चलता रहा और अकाल पीड़ित जनता ने अपने राजा की उदारता का पूरा मान रक्खा और एक अति भव्य इमारत तैयार हुई। अब उम्मेद भवन का एक हिस्सा संग्रहालय है , एक हिस्से में राज-परिवार रहता है और शेष हिस्सा एक पांच-सितारा होटल है। जोधपुर के राज परिवार को जनता का बहुत प्रेम मिला और कभी जोधपुर महाराज हणवंत सिंह जी का दिया हुआ चुनावी नारा ' म्हें थांसू दूर नहीं हूँ '  प्रजा और राजा के बीच की दूरी को लगभग समाप्त कर गया था। राजवंश अब इतिहास बन चुके हैं पर लोकतंत्र ने नए सम्राटों का राज्याभिषेक कर दिया है। कहने को हर नेता कहता है कि वो जनता से दूर नहीं है पर गरीब जनता के प्रतिनिधि जिस पांच-सितारा महफ़िल में जूतम-पैजार का खेल खेलते हैं वहां तो साहिब आपका और मेरा तमाशा देखने जाना भी मुश्किल है क्योंकि हम लोग आम आदमी जो ठहरे .......

- अशोक जमनानी                  




 
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