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गुरुवार, सितंबर 20, 2012

राजस्थान-यात्रा-२०-महामंदिर






राजस्थान-यात्रा-२०-महामंदिर

कभी-कभी ऐसा होता है कि हम अपनी ही जमात के लोगों के आचरण से क्षुब्ध हो उठते हैं. अपने आप को लेखक और बुद्धिजीवी कहलाने का शौक पाले लोगों की असली बौद्धिकता का पता तब चलता है जब आप हकीकत से रूबरू होते हैं. जोधपुर के महामंदिर की तलाश में ऐसा ही कुछ घटित हुआ. मैंने  कई विद्वानों की लिखी किताबों में इस मंदिर के बारे में पढ़ा था और उसी संकल्पना के साथ मैंने ऑटो रिक्शा वाले से महामंदिर चलने के लिए कहा. कुछ देर बाद उसने मुझे जहां छोड़ा वहां तो कोई मंदिर था ही नहीं. विद्वानों की लिखी किताबों के अनुसार तो यह मंदिर ५७० भवन वाला सवा मील की  परिधि वाला भव्य मंदिर था . मैं हैरान था आखिर इतना बड़ा मंदिर जिसका इतना अधिक ऐतिहासिक महत्त्व है गया तो गया कहाँ !! असल में  यह मंदिर महाराजा मानसिंह द्वारा अपने गुरु आयस देवनाथ जी के लिए बनवाया गया था और देवनाथ जी नाथ सम्प्रदाय की जलंधरनाथ पीठ के प्रमुख पुजारी थे . उनके आदेश को मानकर ही मानसिंह जी ने जालोर से जाने का विचार त्याग दिया था जिसके कारण वो जोधपुर महाराजा की आकस्मिक मृत्यु के बाद जोधपुर के महाराजा बने. बाद में जब आयस देवनाथ जोधपुर आये तो उनके लिए अति भव्य महामंदिर बनवाया गया. कई किताबों में यह कहानी और महामंदिर के चित्र मिल जायेंगे जिनमे से कुछ किताबें तो इसी वर्ष का प्रकाशन भी हैं. परन्तु दुःख इस बात का है कि किसी भी लेखक ने वहां जाकर वास्तविक स्थिति का अध्यन करना जरूरी नहीं समझा कट-कॉपी-पेस्ट आज के लेखन का मूल-मन्त्र जो  बन चूका है. वास्तविकता तो यह है कि महामंदिर का सारा का सारा भूगोल बदल चुका है अब वहां एक घनी आबादी वाला मोहल्ला और एक लम्बा-चौड़ा बाज़ार है. कोई भी आपको महामंदिर का पता तक नहीं बताता बड़ी मुश्किल से पूछते-पूछते जब मैं उस ऐतिहासिक इमारत तक पहुंचा तो उसका दरवाजा बंद था . किसी तरह भीतर गए तो पता चला कि मुख्य  मंदिर के बीच के  हिस्से को छोड़कर शेष हिस्से में एक स्कूल चलता है. मंदिर के चारो और घनी बसाहट के कारण मंदिर लगभग छुप सा गया है . मंदिर की बेशकीमती पेंटिंग्स ख़त्म होने की कगार पर हैं और मंदिर की ख़ूबसूरती और भव्यता केवल उन महान लेखकों की किताबों के चित्रों में सुरक्षित है जो शायद कभी वहां गए ही नहीं हैं. एक भव्य ऐतिहासिक मंदिर खो गया है और बुद्धिजीवी इतिहासकार अपनी किताबों में उसका बढ़ा-चढ़ा कर वर्णन कर रहे हैं . मंदिर के आँगन में एक महिला कपड़े धो रही थी मैंने पूछा कि कितने लोग इस मंदिर को देखने रोज़ आते हैं ? उसने कहा ' तीन महीने पहले कुछ अंग्रेज आये थे.' मैं समझ गया उन अंग्रेजों ने उन्हीं किताबों में से किसी एक किताब का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा होगा जिन्हें पढ़कर मैं महामंदिर देखने चला आया . वो महामंदिर जिसकी परिधि कभी सवा मील की थी और जिसका पता आज वो भी नहीं बताते जो उस मौहल्ले में रहते हैं जिसका नाम है- महामंदिर.
- अशोक जमनानी               


 
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