Loading...
गुरुवार, अक्तूबर 04, 2012

राजस्थान-यात्रा-25-राज रणछोड़ जी




राजस्थान-यात्रा-25-राज रणछोड़ जी

राजस्थान यात्रा के संस्मरण-लेखन को एक अल्प-विराम देना है। अभी बहुत कुछ है जो अनकहा रह गया लेकिन इस अल्प-विराम के बाद शायद जब फिर संवाद होगा तो वो भी अनकहा नहीं रह जायेगा। और फिर साहित्य-अकादेमी ने राजस्थान जाने के लिए ग्रांट भी  दी है तो  उस यात्रा में जो कुछ नया होगा वो भी उसमें शामिल हो जायेगा । बहुत अधिकार के साथ माणिक ने धमकी दी है कि जब तक मैं चित्तौड़ नहीं जाऊंगा वो मेरे यहाँ भी नहीं आएगा। इसलिए उस यात्रा की शुरुआत चित्तौड़ से ही करनी होगी चित्तौड़ मतलब मीरां। मीरां मतलब प्रेम में डूबा हुआ विद्रोह। ऐसा विद्रोह जिसमे मीरां की देह तो मिट गयी पर मीरां केवल कृष्ण में नहीं समायी बल्कि इस देश की माटी में इस तरह घुल-मिल गयी की आज भी कहीं सच्चा प्रेम महकता है तो वही दीवानी रानी याद आती है। रानी तो राजकंवर भी थीं। जोधपुर महाराज जसवंत सिंह से उनका विवाह हुआ तब वो नौ बरस की थीं। तेरह वर्ष की आयु में ससुराल आयीं तो एक बार मेहरानगढ़ दुर्ग में प्रवेश के बाद वो कभी उसके बाहर नहीं गयीं। राज रणछोड़ जी का मंदिर उन्होंने महाराजा जसवंत सिंह जी की मृत्यु के बाद अपनी वृद्धावस्था में बनवाया था। यह मंदिर किले के बाहर है इसलिए रानी कभी इस मंदिर में नहीं आयीं वो किले की प्राचीर से ही इस मंदिर के दर्शन किया करती थीं। आरती के बाद पुजारी आरती लेकर बाहर खड़े होते थे और रानी दुर्ग की प्राचीर से आरती को प्रणाम करती थीं। राज-परिवार की मर्यादा पालन की अद्भुत दास्तान है इस रानी का पूरा जीवन। मेरी राजस्थान-यात्रा में मुझे इस बात का बेहद मलाल था कि इतने कलाकारों से मिलने के बाद भी किसी ने मुझे मीरां का कोई भजन नहीं सुनाया। जन्माष्टमी की रात राज रणछोड़ जी के मंदिर में गया तो सोचा ही नहीं कि वहां मेरी शिकायत दूर करने का प्रबंध न जाने किस अदृश्य ने किया है। मंदिर के द्वार पर बैठा शहनाई वादक जिस मीठे सुर में मीरां का भजन बजा रहा था वो संभवत: बिस्मिल्लाह खां साहब को सुनने पर जो अनुभव हुआ था उसके जैसा ही था बल्कि इस  वादन में तो भक्ति का जो अद्भुत प्रवाह था वो मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा। मीरां भी इसी राजस्थान के राज परिवार की कुलवधू थी लेकिन उसके प्रेम ने सगर्व घोषणा की  ' छाड़ि दई कुल की बानी कहा करे कोई ' और दूसरी ओर इस मंदिर को बनवाने वाली रानी राज कंवर थीं जो एक बार ससुराल की देहरी के भीतर गयीं तो कभी अपने ही बनवाये मंदिर में भी दर्शन करने नहीं गयीं। लेकिन कृष्ण तो कृष्ण है उसके प्रेम से कौन बच सकता है। रानी ने मंदिर को नाम दिया रणछोड़ जी का मंदिर लेकिन रणछोड़ से पहले अपने नाम का आधा हिस्सा 'राज' उसमे जोड़कर उसे राज रणछोड़ जी का मंदिर कर दिया। मर्यादित प्रेम के बनवाये मंदिर के द्वार पर विद्रोही प्रेम का गीत गूँज रहा था और भीतर बैठे  एक सांवरे के अधरों पर वही रहस्यमयी मुस्कराहट थी जो मुस्कराहट किसी भी रानी को दीवानी बना देती है।

- अशोक जमनानी                
 
TOP