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बुधवार, अक्तूबर 17, 2012

साहित्य और समाज


न कुआँ मोहम्मद के पास जाता है न मोहम्मद कुएं के पास आता है।

एक साहित्यकार होने के नाते समाज से जुड़ना और यह समझने की कोशिश करना कि उसकी गति-मति किस प्रवाह में बह रही है,रचनात्मक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। मुझे जब भी कोई मौका मिलता है तो मैं भिन्न-भिन्न क्षेत्र के लोगों से लम्बी-लम्बी [ कभी-कभी लोग खीज भी जाते हैं ] बातचीत करता हूँ। दूसरी बातें समझने के साथ-साथ मैंने यह भी जानना चाहा कि लोग वर्तमान साहित्य के बारे में क्या सोचते हैं। लेकिन मेरा यह सवाल बिल्कुल बेमानी सिद्ध हुआ क्योंकि अधिकांश लोग तो वर्तमान साहित्य से सर्वथा अपरिचित ही हैं। स्थिति की भयावहता का अनुमान इस बात से लग जायेगा कि मैंने अलग-अलग शहरों के 6 महाविद्यालयों के उन छात्रों से बात की जो हिंदी-साहित्य से  ऍम.ए. कर रहे थे और उनसे एक ही सवाल पूछा कि क्या वो वर्तमान दौर के 5 लेखकों और उनकी एक-एक कृति का नाम बता सकते हैं?

मेरे आश्चर्य को शायद बहुत ऊँचा उठना था इसलिए कोई भी मुझे 5 लेखकों और उनकी एक-एक कृति का नाम नहीं बता पाया। मैंने स्तर कम किया और 4 पर आया फिर 3 पर आया लेकिन स्थिति जस की तस रही। सामान्यतया छात्र एक-दो लेखकों के नाम बता पाए और केवल 10 प्रतिशत छात्र एक-दो लेखकों की एक-एक किताब का नाम बता पाए। ये स्थिति हिंदी-साहित्य से ऍम.ए. कर रहे छात्रों की है बाकी लोगों की क्या हालत होगी वो बताने की शायद कोई जरूरत ही नहीं है। एक ओर तो यह स्थिति है और दूसरी ओर है साहित्यकारों का एक बड़ा समूह जो साहित्य-सृजन के अलावा भी अनेक क्षेत्रों की प्रतिभा का बोझा उठाये हुए है। कई-कई सम्मानों-पुरस्कारों से लदा हुआ ,फैलोशिप ,ग्रांट, कमेटियों की सदस्यता, अनवरत चलते आयोजनों की भागीदारी में लिप्तता आदि-आदि जैसी अकथ कहानी। लेकिन इस बात से बेखबर कि उसके कुएं को छोड़कर दुनिया में कहीं कोई समन्दर भी है जहाँ कोई उनका नाम तक नहीं जानता। 

साहित्य और समाज का रिश्ता टूटा तो साहित्य हाशिये पर गया। अब साहित्यकार ठहरे बुद्धिनिधान उन्होंने साहित्य को समाज से जोड़ने के स्थान पर हाशिये को ही सम्प्रभुता बख्श दी और अपना धर्म-कर्म क्षेत्र बना लिया। शेष बचा समाज, तो ये मान लिया गया कि हम बात तो उसी की करेंगे और उसकी गरज होगी तो वो हमारे पास आकर वो तथाकथित महान ज्ञान प्राप्त करेगा। बस तो अब हालत ये है कि न कुआँ मोहम्मद के पास जाता है न मोहम्मद कुएं के पास आता है। समाज को डूबते-डूबते तैरना पसंद है और साहित्यकार जिस साहित्य की नाव को लेकर उसे उबारने चला है उस नाव में ही छेद है इसलिए वो समाज तक पहुँचने से पहले ही डूब जाती है। हमारे समय के सारे महान साहित्यकार कभी जाकर पता लगाएं कि कितने लोगों ने उन्हें पढ़ा है तो शायद वो नाव का छेद बंद करने की कोशिश करेंगे वर्ना तो डूबने वाला डूबकर खुश है और जिनके ऊपर तैरना सिखाने की जिम्मेदारी है वो तो खुद ही तैरना भूल चुके थे इसलिए कब के डूब चुके, अब छेद वाली नावों पर उनके प्रेत खड़े हैं जो अपनी-अपनी  महानता के झंडे फहरा रहे है।



इलाहबाद,उत्तर प्रदेश में एक व्यावसायिक प्रवृति के परिवार में जन्म।
रूचि और पठन-पाठन की प्रवृति साहित्य जगत के करीब ले आयी।
सालों से होशंगाबाद,मध्य प्रदेश की धरती पर बसर।                         
कविता,कहानी के साथ ही उपन्यास विधा में गहन रुझान।
प्रकाशित औपन्यासिक कृतियाँ: बूढी  डायरी, को अहम्,व्यास गादी,छपाक-छपाक
मध्य प्रदेश साहित्य अकादेमी का दुष्यंत कुमार अवार्ड मिल चुका है।
स्पिक मैके  जैसे छात्र आन्दोलन  में वर्षों से स्वयंसेवा की अनुभूति।
केन्द्रीय साहित्य अकादेमी की साहित्यिक यात्रा योजना स्कोलाशिप-2012
राजस्थानी पृष्ठभूमि पर केन्द्रित पांचवां उपन्यास 'खम्मा ' शीघ्र प्रकाश्य।
संपर्क:-सतरास्ता,होटल हजुरी,होशंगाबाद,मध्य प्रदेश
ईमेल-mail@ashokjamnani.com , फेसबुक  
 
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