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शुक्रवार, अक्तूबर 26, 2012

अमृत लाल वेगड़

अमृत लाल वेगड़

वेगड़ जी को केवल एक साहित्यकार के रूप में देखना नाइंसाफ़ी होगी। वो स्वयं ही कहते हैं कि मैं साहित्य में डेपुटेशन पर आया हूँ। लेकिन शांति-निकेतन में आचार्य नन्द लाल बसु के छात्र रहे इस कला साधक ने भारतीय-साहित्य को जो समृद्धि बख्शी है वो संभवत: तथाकथितबड़े-बड़े साहित्यकार भी नहीं दे पाए। नर्मदा के सौन्दर्य ने उन्हें इतना आकर्षित किया कि वो उसके किनारे-किनारे वर्षों तक पद-यात्रा करते रहे और 4000 किलोमीटर से अधिक की अत्यंत कष्ट साध्य पद यात्राओं ने साहित्य-जगत को तीन अमूल्य किताबें दीं -  'सौन्दर्य की नदी नर्मदा','अमृतस्य नर्मदा' और 'तीरे-तीरे नर्मदा'.  मेरे प्रति उनका स्नेह मेरे लिए बहुत मूल्यवान है और उनसे जुड़े अनुभव लिखने बैठूँगा तो शायद एक नई किताब ही बन जाएगी।

लेकिन अपनी आयु के आठ दशक पार कर चुके वेगड़ जी अपने सहज विनोदी स्वभाव के बावजूद तब व्यथित लगते हैं जब उनसे मैं कुछ दशक पूर्व की नर्मदा और अब की नर्मदा के बारे में बात करता हूँ। वो कहते हैं " मैंने अपनी पहली किताब का नाम सौन्दर्य की नदी नर्मदा इसलिए रखा क्योंकि मुझे लगा कि इस नदी के जैसा सौन्दर्य तो कहीं हो ही नहीं सकता और दूसरी किताब का आरम्भ भी इस प्रार्थना को प्रथम पृष्ठ पर लिखकर किया कि नर्मदा तुम अत्यंत सुन्दर हो अपने सौन्दर्य का प्रसाद मुझे दो ताकि मैं उसे सब तक पहुंचा सकूँ।लेकिन कुछ समय पूर्व प्रकाशित अपनी तीसरी किताब के बारे में वो कहते हैं कि अब मैंने नर्मदा की जो दुर्दशा देखी है उसके बाद नर्मदा का सौन्दर्य तो छोड़िये  मुझे तो अकेले सौन्दर्य शब्द का उपयोग करने में भी डर लगने लगा है और  इस किताब में मैंने इस शब्द के प्रयोग से स्वयं को यथासंभव दूर ही रखा है।"  

जो लोग आर्थिक उदारीकरण के साहित्य पर प्रभाव जानना चाहते हैं उनके लिए यह कहना ही पर्याप्त होगा कि एक कला-साधक जिन्हें एक नदी के सौन्दर्य ने साहित्यकार बना दिया अब वो प्रकृति के सौन्दर्य का प्रतीक रही एक नदी-नर्मदा के दोहन-शोषण को देखकर इतने विचलित हैं कि आजकल उन्हें सौन्दर्य शब्द के प्रयोग से ही डर लगता है।

- अशोक जमनानी
 
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