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सोमवार, अक्तूबर 29, 2012

किरण सेठ


किरण सेठ 

स्पिक-मैके के संस्थापक और आइ .आइ . टी . दिल्ली जैसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान में शिक्षण कार्यरत पद्मश्री से सम्मानित डॉ . किरण सेठ के साथ अब तो कई वर्षों के  जुड़ाव के कारण शायद मैं उन्हें समझने लगा हूँ लेकिन पहली बार जब उनसे मिला था तो उन्होंने जो किया-कहा वो आज तक नहीं भूला हूँ। स्पिक-मैके से जुड़ाव के बाद पहली बार किसी सांस्कृतिक संघटन की मीटिंग में गया था। विद्यार्थी जीवन में जैसे सब होते हैं मैं भी वैसा ही था। साथ में  कुछ मित्र भी थे। भोपाल के मैनिट ( तब ऍम ए सी टी  ) जहाँ मीटिंग होनी थी हमने सभा-गृह के बाहर लापरवाही के साथ जूते उतारे और वहां लोगों के जूते व्यवस्थित कर रहे एक शख्स को उचटती निगाह से देखकर भीतर चले गए। कुछ देर बाद हम सब का परिचय डॉ . सेठ से करवाया गया तो हम सबको मानो सांप सूंघ गया। ये तो वही थे जो बाहर लोगों के जूते व्यवस्थित कर रहे थे। फिर उस दिन उन्होंने जो कहा वो मैं आज तक नहीं भूला। उन्होंने कहा कि एक ऐसी जगह जहाँ  बाहर अव्यवस्थित जूतों का ढेर लगा हो वहां कोई कहे कि भीतर बैठे लोग संस्कृति के उत्थान के लिए चिंतन कर रहे हैं तो क्या कोई यकीन करेगा ? संस्कृति के लिए काम करने के लिए ये भी ज़रूरी है कि हम खुद सुसंस्कृत हों और उसकी शुरुआत अपने जूते-चप्पल व्यवस्थित ढंग से उतार कर की जा सकती है। आज भी मैं उनकी बात नहीं भूला हूँ। नए जुड़ने वाले आज भी वही करते हैं जो कभी हमने किया था लेकिन स्पिक-मैके से जुड़ा कोई न कोई पुराना व्यक्ति उनकी भूल सुधार ही देता है। डॉ . सेठ का प्रिय वाक्य है  ' मोहम्मद कुएं के पास नहीं जायेगा तो कोई बात नही,कुआँ मोहम्मद के पास आएगा।'           

- अशोक जमनानी 
 
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