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सोमवार, अक्तूबर 15, 2012

नि:शब्द

नि:शब्द 

शब्द-पंथ कर तिरोहित 
नि:शब्द रहने दो मुझे 
मौन के आलोक में 
संवाद का सृजन करूँ 
शैथिल्य है या है पलायन 
या पराजय जान  लो 
चिर-दग्ध भाव का विसर्जन 
या इसे तुम मान लो 
शब्दों की सामर्थ्य जब 
अर्थ-हीन हो गयी
नि:संग मौन आज मुझसे 
देह का तुम दान लो .
आकार को कर अब प्रवाहित 
निराकार दो मुझे 
मैं प्रलय के काल में 
सृष्टि-स्वप्न को धरूँ   .


- अशोक जमनानी 


 
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