Loading...
शुक्रवार, नवंबर 16, 2012

चंद्रकांत देवताले जी के साथ कुछ वक़्त



चंद्रकांत देवताले जी के साथ कुछ वक़्त 

उज्जैन की यात्रा थी तो पारिवारिक लेकिन हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार चंद्रकांत देवताले जी से मिलने से विरत रहना बहुत बुरा लग रहा था। उन्हें फोन लगाया तो वो भी किसी पारिवारिक आयोजन में व्यस्त थे,  फिर स्वास्थ्य भी सीमाबद्ध करता ही है लेकिन उन्होंने भी वक़्त निकल लिया। ढेर सारा स्नेह पाकर लौटा तो उनकी सुनाई एक कविता देर तक भीतर गूंजती रही। आप भी देखिये ......


 माँ के लिए संभव नहीं होगी मुझसे कविता 
अमर चीटियों का एक दस्ता
मेरे मस्तिष्क में रेंगता रहता है
माँ वहां हर रोज़ चुटकी-दो-चुटकी आटा डाल देती है

जब कोई भी माँ छिलके उतारकर
चने,मूंगफली या मटर के दाने
नन्हें हाथों पर रख देती है
तब मेरे हाथ अपनी जगह पर
थरथराने लगते हैं   

माँ ने हर चीज़ के छिलके उतारे मेरे लिए
देह,आत्मा,आग और पानी तक के छिलके उतारे
और मुझे कभी भूखा सोने नहीं दिया

मैंने धरती पर कविता लिखी है
चंद्रमा को गिटार में बदला है
समुद्र को शेर की तरह आकाश के पिंजरे में खड़ा कर दिया
सूरज पर कभी भी कविता लिख दूंगा

पर माँ पर नहीं लिख सकता कविता   .................... चन्द्रकान्त देवताले

- अशोक जमनानी
 
TOP