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शुक्रवार, नवंबर 02, 2012

शरद जोशी के बहाने

 शरद जोशी के बहाने - कांग्रेस  

इन दिनों हर ओर ये शोर सुनाई देता है कि अब पक्ष और विपक्ष में कोई अंतर ही नहीं बचा है। लेकिन हम ये भूल जाते है कि आज जितने भी दल भारतीय राजनीति में हैं वो या तो सत्ता में हैं या फिर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता में रह चुके हैं और जो लोग आन्दोलन कर रहे हैं वो भी सत्ता पाना चाहते हैं। लगभग  35 वर्ष पहले शरद जोशी जी ने एक व्यंग्य लिखा था जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उनका मानना था कि कांग्रेस एक दल नहीं है वरन एक विचार है और जो सत्ता में हैं ,थे या या फिर सत्ता पाना चाहते हैं वो असल में कांग्रेसी होने की फिराक में हैं क्योंकि कांग्रेस एक दल नहीं है वो सत्ता का चरित्र है जो भी सत्ता में जायेगा वो आखिर में कांग्रेसी ही बन जायेगा। आप भी उनका लिखा व्यंग्य पढ़िए और सोचिये कि कौन-कौन कांग्रेसी है और कौन -कौन होने के लिए हाथ-पाँव मार रहे हैं।
-अशोक जमनानी
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कांग्रेस हमारी आदत बन गयी। कभी न छूटने वाली बुरी आदत।हम सब यहाँ-वहां से,दिल-दिमाग और तोंद से कांग्रेसी होने लगे। इन तीस सालों  में कांग्रेस हर भारतवासी के अंतर में गेस्ट्रिक ट्रबल की तरह समा गयी।पूरे तीस साल तक देश ने यह समझने की कोशिश की कि कांग्रेस क्या है?खुद कांग्रेसी यह नहीं समझ पाया कि कांग्रेस क्या  है।लोगों ने कांग्रेस को ब्रह्म की तरह नेति-नेति के तरीके से समझा।जो दायें नहीं है वह कांग्रेस है।जो बाएं नहीं है वह कांग्रेस है। जो मध्य में भी नहीं है वह कांग्रेस है। जो मध्य सेबाएं है वह कांग्रेस है। नहीं, जो वहां भी नहीं है सो कांग्रेस है। मनुष्य जितने रूपों में मिलता है कांग्रेस उससे ज्यादा रूपों में मिलती है।कांग्रेस सर्वत्र है।हर कुर्सी पर है।हर कुर्सी के पीछे है। हर कुर्सी के सामने खड़ी है।हर सिद्धांत कांग्रेस का सिद्धांत है और उस सिद्धांत के खिलाफ जो सिद्धांत है वो भी कांग्रेस का सिद्धांत है।इन सभी सिद्धांतों पर कांग्रेस अचल खड़ी हिलती रही।हिंदी की हिमायती रही, अंग्रेजी को चालू रखा।आत्मनिर्भरता पर जोर दिया, विदेशों से मदद मांगते रहे।

यूथ को बढ़ावा दिया,  बुड्ढों को टिकट दिया।जो जीता वो मुख्यमंत्री बना। जो हारा सो  गवर्नर हो गया।जो केंद्र में बेकार था उसे राज्य में भेजा।जो राज्य में बेकार था उसे केंद्र में ले आये।जो दोनों जगह बेकार था उसेअंबेसेडर बना दिया वो देश का प्रतिनिधित्व करने लगा।एकता पर जोर दिया ,आपस में लड़ते रहे।जातिवाद का विरोध किया मगर अपने वालों का हमेशा ख्याल रखा।प्रार्थनाएँ सुनीं और भूल गए।आश्वासन दिए पर उन्हें निभाया नहीं। जिन्हें निभाया वो आश्वस्त नहीं हुए।मेहनत पर जोर दिया, अभिनन्दन करवाते रहे।जनता की सुनते रहे,अफसर की मानते रहे।शांति की अपील की , भाषण देते रहे।खुद कुछ किया नहीं दूसरे का होने नहीं दिया।संतुलन की इन्तहा यह हुई कि जब उत्तर में जोर था तब दक्षिण में कमज़ोर थे।दक्षिण में जीते तो उत्तर में हार गए।जयजयकार होती रही, वोट मिले नहीं।ज़ोर बना रहा,कमज़ोर पड़ गए।

- शरद जोशी 
 
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