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रविवार, नवंबर 25, 2012

घुटन

घुटन

कितनी घुटन है
रास्तों  और मंज़िलों पर
क्यों चलते हो फिर भी
क्यों पहुँचते हो फिर भी
तुम अपने क़दमों के ग़ुलाम हो क्या  ?
मैं  तो हूँ
सदियों से
देखते नहीं
बोलते वक़्त कितना हांफता हूँ
अक्सर गुम हो जाते हैं कई शब्द
फिर भी चलता हूँ
ग़ुलाम जो ठहरा 
और तुम ???
तुम तो कह रहे थे
कि आज़ाद हो तुम
लेकिन जब मिलते हो
तो हांफते हो तुम
घुटता है तुम्हारा दम
और बोलते वक़्त
गुम हो जाते हैं शब्द तुम्हारे
कई नहीं
बल्कि ...  सारे के सारे ...

- अशोक जमनानी
 
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