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शुक्रवार, नवंबर 09, 2012

स्वामी विवेकानंद, अमेरिका और कविता



स्वामी विवेकानंद, अमेरिका और कविता 

इन दिनों मीडिया में अमेरिका के चुनाव के कारण और एक राजनेता की टिप्पणी के कारण बहुत कुछ कहा-लिखा गया। पिछले वर्ष स्वामी विवेकानंद पर साहित्य अकादमी मध्य-प्रदेश के एक आयोजन में वक्ता के रूप में बुलाया गया तो मैंने तय किया कि मैं अपनी बात के केंद्र में स्वामी विवेकानंद द्वारा रचित किसी कविता को रखूँगा। मैंने जिस कविता को चुना वो कविता स्वामी विवेकानंद ने अपने अमेरिकी शिष्यों को अमेरिकी-स्वातन्त्र्य की घोषणा- दिवस की जयंती पर सुनाने के लिए रची थी। बेहद सार्थक ये कविता जब रची गयी तब हमारा अपना देश ग़ुलाम था। संभवत: इसीलिए यह कविता एक आज़ादी के  मिलने की बात के साथ-साथ उस आज़ादी के उजाले को सब तक पहुँचने की बात भी करती है। लेकिन उनके लिए आज़ादी का अर्थ केवल किसी मुल्क की राजनैतिक आज़ादी नहीं था वो तो चाहते थे कि हर एक इन्सान को वो आज़ादी मिले जो उसके जीवन का पतझड़ ख़त्म करके बसंत ले आये और जहाँ सम्पूर्ण मानवता उन्नत-मस्तक हो। आज जब दुनिया की अधिकांश आबादी तकलीफ में है तब उनकी ये कविता शायद विचार करने की प्रेरणा देती है और आज़ादी के विस्तार के लिए प्रयास की कोशिश के लिए भी बहुत कुछ कहती है .........         


वो देखो
वे घने बादल छंट रहे हैं
जिन्होंने धरती को
अशुभ छाया से ढक लिया था
लेकिन पाकर तुम्हारा
चमत्कार भरा स्पर्श
विश्व जाग रहा है
पक्षियों ने सहगान गाये हैं
फूलों ने तारों की तरह चमकते
ओंस कणों के  मुकुट पहनकर
झुक-झूमकर तुम्हारा
सुन्दर स्वागत किया है
झीलों ने प्यार भरा हृदय
तुम्हारे लिए खोला है
अपने सहस्त्र-सहस्त्र कमल-नेत्रों से
मन की गहराई से
निहारा है तुम्हें   
हे प्रकाश के देवता !
सभी तुम्हारे स्वागत में संलग्न हैं 
आज तुम्हारा नव-स्वागत है
हे सूर्य, तुम आज मुक्ति-ज्योति फैलाते हो
तुम्हीं सोचो
संसार ने तुम्हारी कितनी प्रतीक्षा की
कितना खोजा तुम्हें
युग-युग तक देश-देश घूमकर तुम्हें खोजा
कुछ ने घर छोड़े
दोस्तों का प्यार खोया
खुद को निर्वासित किया
निर्जन महासागरों,सुनसान जंगलों में कितना भटके
एक-एक कदम पर मौत और ज़िन्दगी का सवाल आ गया
लेकिन वह दिन भी आया
जब संघर्ष फले
पूजा-श्रद्धा और बलिदान पूर्ण हुए
अंगीकृत हुए - तुमने अनुग्रह किया
और सम्पूर्ण मानवता पर
आज़ादी का उजाला फैला दिया
ओ देवता,
निर्बाध बढ़ो अपने पथ पर
तब तक
जब तक
यह सूरज
आकाश के मध्य में न आ जाये
जब तक
तुम्हारा आलोक
विश्व के हर देश में न फैले
जब तक  
 नारी और पुरुष
उन्नत मस्तक होकर यह न देखें
कि उनकी जंजीरें टूट गयीं
और नए सुखों के बसंत में
उन्हें
नया जीवन मिल गया। ...................................... - स्वामी विवेकानंद


- अशोक जमनानी












 
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