Loading...
गुरुवार, नवंबर 22, 2012

सर्द रात

सर्द रात 

सर्द रात
अपने पूरे हुस्न के साथ
बाअदब  
घर की चौखट पर खड़ी है
बंद दरवाज़े और खिड़कियों की दरारों से
आयेगी टुकड़े-टुकड़े होकर
फिर जुड़ भी जाएगी न जाने कैसे
तब अहिस्ता-अहिस्ता 
अपने जिस्म को फैला देगी मेरे ऊपर
सो जाएगी मेरी रजाई में दुबक कर
मेरी नींद को मीठी गहरायी देकर  
सर्द रात
अपने पूरे हुस्न के साथ 
बेखौफ़-बेमुरव्वत  
फुटपाथ पर भी खड़ी है
चीथड़ों में लिपटी
जिंदा लाशों के पास  .............

- अशोक जमनानी




 
TOP