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गुरुवार, नवंबर 08, 2012

टिगरिया का लोक देवता

टिगरिया का लोक देवता 

श्री प्रेम शंकर रघुवंशी मध्य-प्रदेश के वरिष्ठ साहित्यकारों में शुमार होते हैं। उन्होंने अपनी सद्य प्रकाशित कृति 'टिगरिया का लोक-देवता- भवानी प्रसाद मिश्र' मुझ तक पहुंचायी - आभार।पुस्तक में मुख्यतया 1973 में आयोजित भवानी प्रसाद मिश्र के अभिनन्दन समारोह जो कि उनकी अपनी जन्म-भूमि पर आयोजित किया गया था के संस्मरण हैं साथ ही मिश्र जी के व्यक्तित्व-कृतित्व पर प्रकाश डालते कुछ आलेख भी हैं। आज साहित्य और साहित्यकारों की जो स्थिति है उसे देखते हुए यह कल्पना भी रोमांचित करती है कि आज से लगभग 40 वर्ष पूर्व अपने क्षेत्र के लाड़ले कवि  को सम्मानित करने के लिए हजारों की तादाद में लोग एक स्थान पर एकत्रित हुए थे और होते भी क्यों नहीं भवानी दादा  की कविता और स्वयं भवानी प्रसाद मिश्र जहाँ भी होते महफ़िल का जमना तय ही होता था। आज जब साहित्य हाशिये पर है और किसी सम्मान समारोह का आयोजक सम्मानित होने वाले साहित्यकार से आधिक महत्वपूर्ण है तब ये जानना रोचक हो सकता है कि  भवानी प्रसाद मिश्र के दौर में स्थिति क्या थी। इस किताब का एक प्रसंग कुछ रौशनी लेकर आगे बढ़ता है और एक दिलचस्प  वाक्या बयां करता है।
.....उस  कार्यक्रम में हिस्सा लेने पूरे देश से साहित्यकार आये थे और अगले दिन जब उन साहित्यकारों के भोजन के बाद जब दूसरी पंगत बैठने वाली थी तब उन्होंने रघुवंशी जी बुलाया और जोर से डांटकर पूछा कि लोग पत्तलों में इतनी जूठन छोड़कर जा रहे हैं और तुम किसी से कुछ कह तक नहीं रहे। रघुवंशी जी ने कहा कि ये सब साहित्यकार हैं,हमारे मेहमान हैं मैं क्या कहूँ। भवानी दादा ने तुरंत कहा कि ये साहित्यकार गमले में भी चार दाने अनाज के नहीं उगा सकते लेकिन जूठन छोड़ने में सब एक से बढ़कर एक हैं।आयोजकों को अंत में व्यवस्था को ठीक करना ही पड़ा तब कहीं जाकर भवानी दादा संतुष्ट हुए।
आज कितने साहित्यकार हैं जो किसी सम्मान समारोह के मुख्य कर्ता-धर्ता को सरेआम डांट सकें? अब तो हालत ऐसे हैं कि कई आयोजक साहित्यकार से आधिक खुद मंच पर छाये रहते हैं और सम्मानित होने वाले साहित्यकार अपने साहित्य की तरह हाशिये पर होते हैं। लेकिन भवानी प्रसाद मिश्र उस मिट्टी के बने थे जो न अंग्रेजों के आगे झुकी और न आपात-काल में निरंकुश सत्ता के आगे।
वो किसी को भी चुनौती दे सकते थे तभी तो उन्होंने लिखा ....
मौसम को चुनौती अगर देते नहीं हैं हम
तो मौसम की हिम्मत ज्यादा बढ़ ही जाती है।

- अशोक जमनानी       
  
 
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