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मंगलवार, दिसंबर 11, 2012

बंधन और मुक्ति

बंधन और मुक्ति 

बूढ़ी डायरी उपन्यास लिखने के दौरान बहुत सा वक़्त जबलपुर के आस-पास बिताया था। भेड़ाघाट के पास  त्रिपुर सुन्दरी का एक बहुत प्रसिद्ध मंदिर है जहाँ कलचुरि कर्ण द्वारा स्थापित त्रिपुर सुन्दरी की अद्भुत प्रतिमा का अनगढ़ सौन्दर्य किसी रहस्य की सी सृष्टि करता है। कुछ दिन पहले फिर से इस मंदिर को देखने चला गया था। इस मंदिर की एक खासियत है - यहाँ लाल कपड़े में बंधे हजारों नारियल जो मंदिर में हर जगह बंधे हुए हैं। कई मंदिरों और दरगाहों पर मन्नत के धागे बांधे जाते हैं राजस्थान के पोखरण में एक स्थान पर कई रुमाल बंधे देखे तो कुछ  स्थानों पर तो लोग मानसिक रोगियों को ही बांध आते हैं। विचित्र  हैं ये सारे बंधन भी जो किसी न किसी इच्छा को पूरा करने के लिए बांधे जाते हैं ताकि बांधने वाला मुक्त हो सके  ..... मैंने बूढ़ी डायरी में जहाँ इस मंदिर का ज़िक्र किया वहां लिखा - " हम पहले इच्छाओं को बांधते हैं फिर इच्छाएँ हमें बांध देतीं हैं।" 

- अशोक जमनानी    
 
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