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शुक्रवार, दिसंबर 14, 2012

कलाकार और कहानी

कलाकार और कहानी 

कल एक ब्लॉग पर प्रसिद्ध कथाकार  संजीव की कहानी ' मानपत्र ' प्रकाशित की गई। साथ में एक टिप्पणी भी थी कि  यह कहानी महान सितार वादक रवि शंकर की महानता के पीछे छिपे व्यक्तित्व को लेकर है। ये बहस बहुत पुरानी  हो चुकी है कि किसी कलाकार की निजी ज़िन्दगी पर चर्चा किस हद तक हो।मैं इस बहस को आगे बढ़ाना भी नहीं चाहता। मैंने कहानी पर नकारात्मक टिप्पणी की तो कुछ मित्रों ने सवाल उठाया कि कलाकार के निजी जीवन पर चर्चा क्यों नहीं होनी चाहिए। मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं है बस मैं दो बातें सामने रखना चाहता हूँ। पहली बात यह है की यदि एक कहानीकार स्पष्ट रूप से घोषणा करे कि उसकी कहानी केवल कहानी नहीं है वरन किसी महान व्यक्ति के जीवन का लेखा-जोखा भी है तो फिर उसकी ज़िम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है। ऐसा दावा करने वाले कथाकार को पूरी प्रमाणिकता के साथ तथ्यों को कहानी में पिरोना चाहिए बजाय इसके कि कहानी को रोचक बनाने के लिए कल्पना की ऊँची-ऊँची उड़ान भरी जाये।

हमें याद रखना चाहिए कि हम महान व्यक्ति का बकायदा नाम लेकर गप्प नहीं हांक सकते और न ही कहानीकार होने कारण हमें दूसरों को नीचा दिखाने की छूट हासिल है। दूसरी और महत्वपूर्ण बात यह है कि हम क्यों साहित्यकार होने के बावज़ूद इतने असंवेदनशील हो गए हैं कि हम किसी प्रसिद्ध व्यक्ति की मृत्यु वाले दिन ही अपनी योग्यता सिद्ध करने के लिए आगे आ जाते है और वो भी नकारात्मकता को अपना अस्त्र बनाकर। हर महान व्यक्ति की निजी जिंदगी में ऐसी घटनाएँ भरी पड़ी होती हैं जिन पर कहानियां लिखी जा सकती हैं लेकिन वो सब कहानियां जो उसकी तथाकथित गल्तियों की दास्ताँ सुनती हों उन्हें उसकी लाश के सामने दोहराना क्या कभी भारतीय मानव का सुकर्म बन सकता है? चाहे कोई व्यक्ति कितना ही महान क्यों न हो उसे अपनी गल्तियों का दंड भुगतना ही पड़ता है लेकिन महान व्यक्ति का गप्प आधारित मूल्यांकन न तो भारतीय साहित्य को कुछ देगा और न ही मृत-देह के समक्ष उसे अपमानित करता प्रलाप कभी भारतीयता कहलायेगा।

- अशोक जमनानी   
 
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