Loading...
रविवार, दिसंबर 02, 2012

साये में धूप


साये में धूप  
 
कॉलेज की ' बक-बक ' प्रतियोगिताओं में मुझे जो किताब सबसे अधिक काम आयी वो थी -' साये में धूप '  बाद में मैंने जाना कि दुष्यंत कुमार की रचनाएं संसद से सड़क तक की हर एक बक-बक प्रतियोगिता में पक्ष-विपक्ष दोनों के लिए समान रूप से सहारा बनती रहती हैं । हिंदी-ग़ज़ल को एक नई पहचान देने वाले दुष्यंत कुमार बहुत कम उम्र में दुनियां से रुखसत हुए। कभी उन्होंने कुछ दिन हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार भवानी प्रसाद मिश्र के घर पर पारिवारिक सदस्य की तरह बिताए थे। जब वो अपनी बेहद चर्चित ग़ज़लें लिख रहे थे उन दिनों वे अपने आक्रोश को तो व्यक्त कर ही रहे थे लेकिन भीतर की आग शायद इतनी अधिक थी कि  ग़ज़ल सुनाते वक़्त भी शराब का  गिलास उनके हाथ से छूटता नहीं था। भवानी दादा ने अपने मित्रों से कहा कि कुछ करो क्योंकि दुष्यंत जो पीड़ा पाल रहा है और जिस तेज़ी से ग़ज़लें कहते हुए शराब का भी साथ थामे हुए है वो इसके दिमाग की नसें फाड़ देगा। उनका दुष्यंत कुमार के प्रति बहुत अधिक स्नेह था इसलिए वो ये बात कहकर रो पड़े। आखिर उनकी आशंका सही सिद्ध हुई  और दुष्यंत जैसे शायर बहुत जल्दी ही अलविदा कह गए। एक अच्छी रचना पर  वाह-वाह तो सभी कहते हैं लेकिन उसे कहने के लिए शायर किस तकलीफ से गुजरता है यह बात कम ही लोगों तक पहुँचती है। रेत  पर शंख-सीपियाँ उठाने वाले नहीं जानते कि उनके क़दमों के नीचे आकर रेत का रूप ही विरूपित हो गया। दुष्यंत ने इस पीड़ा को बखूबी बयां किया है .....
       उनको क्या मालूम विरूपित इस सिकता पर क्या बीती
         वे आये तो यहाँ शंख - सीपियाँ उठाने आयेंगे ..................... ( दुष्यंत कुमार )


- अशोक जमनानी 
   
 
TOP