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शनिवार, दिसंबर 22, 2012

नीव

नीव 

नीव ने कोशिश की
गुहार लगाने की
कंगूरे के द्वार पर
कंगूरे ने कहा
ये जुर्रत
चलाओ लाठियां
नीव हारी नहीं
भागी भी नहीं
हाँ ! नीव
सरक रही है
धीरे-धीरे
हा ! कंगूरा
दरक रहा है
धीरे-धीरे

- अशोक जमनानी 



अशोक जमनानी
स्वतंत्र लेखक,
होशंगाबाद (मध्य प्रदेश)

 
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