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गुरुवार, जनवरी 17, 2013

बंदानवाज़ी और क़व्वाली






बंदानवाज़ी और क़व्वाली 

कल कुछ वक़्त हैदराबाद के मशहूर क़व्वाली फ़नकार ज़नाब अतीक़ हुसैन बंदानवाज़ी के साथ बिताने का मौका हासिल हुआ। उनके खानदान में क़व्वाली का सिलसिला लगभग 550 सालों से क़ायम है और उनकी क़व्वाली की ख़ासियत है उसका शास्त्रीय संगीत पर आधारित होना। अतीक़ साहब ने बताया कि उनके यहाँ क़व्वाली सीखने से पहले शास्त्रीय संगीत सीखना बेहद ज़रूरी है और उनके परिवार ने संस्कृत की कई रचनाओं को क़व्वाली में ढाला है। गीत-गोविन्द को क़व्वाली की तरह सुनना मेरे लिए एक अद्भुत अनुभव रहा। मैंने पूछा कि क़व्वाली में क्या बदलाव आये हैं तो उन्होंने कहा कि आजकल लोग समझते हैं कि संगीतबध्द शेर-ओ-शायरी ही क़व्वाली है। जबकि अक्सर शेर तो वाह-वाही लूटने के लिए कहे जाते हैं और वो क़व्वाली का रूहानी सुकून ही ख़त्म कर देते हैं। उन्होंने एक बहुत खूबसूरत भजन क़व्वाली की शक्ल में पेश किया   " तोरे बिन मोहे कुछ नहीं भाये नन्द के लाला " मुझे  लगा ये किसी भक्ति कालीन कवि की रचना होगी लेकिन  उन्होंने बताया कि ये रचना उनके दादा ज़नाब कुर्बान हुसैन बंदानवाज़ी जी की है .............

- अशोक जमनानी            
 
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