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बुधवार, जनवरी 30, 2013

सृजन-संवाद



सृजन-संवाद  

साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित कार्यशाला जनजातीय युवा साहित्यकारों के लिए थी। हमारे उद्बोधन के साथ ही एक सत्र उन युवाओं के रचना-पाठ का भी था। मुझे एक साहित्यकार की लोक गीतनुमा प्रस्तुति  ने सोचने पर विवश कर दिया। उसके बोल थे - " रोजगार गारंटी के पैसा मोबाइल खाय गओ " ये उसकी  ही पीड़ा नहीं थी वरन उन सब की भी पीड़ा है जिन्हें सरकार ने कुछ रकम रोजगार गारंटी के तहत दी लेकिन कॉर्पोरेट जगत वो रकम उनकी जेब से उड़ा ले गया। मोबाइल तो एक प्रतीक भर है पर बाज़ार तो न जाने कितने लुभावने ढंग से ग्रामीण जीवन में प्रवेश कर चुका है। प्रश्न यह है की पहले नरेगा और  अब सीधी सब्सिडी का पैसा गरीब जनता तक इसलिए पहुंचेगा ताकि कॉर्पोरेट जगत उस रकम को नए- नए सुनहरी फंदों के जरिये ऐंठ सके। जो पैसा उन गरीबों के जीवन में रोटी-कपडा-मकान-शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी ज़रूरतों पर खर्च होना चाहिए वो पैसा कॉर्पोरेट जगत लूट रहा है या उसकी तैयारी कर रहा है। अब तो ये लग रहा है कहीं  सरकार ये पैसा सीधे गरीबों तक इसीलिए तो नहीं पहुंचा रही? ठेठ ग्रामीण अंचल में रचा गया एक लोक गीत तो यही कह रहा है। सीधे-सादे गरीबों को मिलने वाली रकम उनकी वास्तविक ज़रूरते पूरी करे अगर सरकारें इसका ध्यान नहीं रख पायीं तो पहले से बहुत कुछ लूट चुका कॉर्पोरेट जगत बचे-खुचे को भी बचने नहीं देगा और खाली पेट  गीत भी कब तक गाये जायेंगे ?

- अशोक जमनानी
 
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