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शुक्रवार, मई 17, 2013

खम्मा पर डॉ आईदान सिंह भाटी जी के विचार





खम्मा पर डॉ आईदान सिंह भाटी जी के विचार

डॉ आईदान सिंह भाटी हमारे देश के शीर्षस्थ साहित्यकारों में शुमार होते हैं। इस वर्ष उन्हें राजस्थानी भाषा के लिए केन्द्रीय साहित्य अकादमी की ओर से सम्मानित किया गया है। उन्होंने खम्मा पर अपनी राय  प्रेषित की है जिसे आपके साथ साझा कर रहा हूँ ..........

   अशोक जमनानी के सभी उपन्यासों के केन्द्र में भारतीय जीवन की वे  उदात्त परम्पराएँ और जीवन स्थितियाँ हैं जिनसे कभी इस समाज का ताना-बाना बुन गया था पर समय और परिस्थितियों के कारण वे कमज़ोर हो गयीं हैं। जो भारतीय संस्कृति अपनी कर्म-निष्ठा के बल पर सबल बनी थी उसमें आम आदमी के निजी और सामाजिक जीवन-मूल्य सदैव महत्वपूर्ण रहे हैं। जीवन-मूल्यों की उन महत्वपूर्ण कड़ियों को अशोक जमनानी ने आज की भाव-भूमि पर देखा-परखा है और उन सबलताओं को पाठकों के सामने रखने का विश्वसनीय प्रयास किया है। आज के इस वैश्वीकरण के दौर में जबकि भारतीय समाज की आँखें लोभ-लाभ के व्यामोह में चुंधियाई हुईं हैं, जमनानी इन सबसे बेपरवाह पाठक के सामने वह भाव-भूमि प्रस्तुत करते हैं जो उसे संवेदनशील तो बनाती ही है साथ ही उसे उस वैचारिक भाव-भूमि पर भी खड़ा करती है जहाँ उसकी परम्परा की जड़े हैं। जमनानी संस्कृति के नाम पर रूढ़ियों का पोषण नहीं करते हैं वरन स्वस्थ जीवन मूल्यों को आज के जीवनगत परिवेश में देखते-परखते हैं। यह परिवेशगत यथार्थ उसे समकालीन जीवन-मूल्यों से जोड़ता है जो कथा को आधुनिक तो बनाता ही है पाठक के सामने सांस्कृतिक संवेदना के अनेक बिम्ब खड़े करके उसे प्रश्नाकुल भी करता है। क्या हम विकास के सही पथ पर हैं ? हम प्रगति और विकास के नाम पर कहाँ जा रहे हैं ? आदि सवाल उसकी मानसिकता में घुसा कर जमनानी पाठक को भारतीय समाज की सबल और स्वस्थ कड़ियाँ थमा  कर आकुल-व्याकुल कर देते हैं।
                       खम्मा उपन्यास में थार के रेगिस्तान में जीवन-यापन करते कलाकार मांगणियार समुदाय की स्थितियों-परिस्थितियों का लेखा-जोखा है। आज़ादी के बाद उनकी सामाजिक परिस्थितियों में बदलाव आये और वे लोकतंत्र और विकास के नाम पर दलालों के शिकार हो गए। पारम्परिक जजमानों से उनके संबंधों में क्षरण आने लगा। बींझा-सूरज की कथा के माध्यम से  मांगणियार गायकों के अतीत, वर्तमान और भविष्य पर उपन्यासकार ने दृष्टि डाली है। सूरज-प्राची, बींझा-सोरठ,क्रिस्टीन,सारंगी,लखी,मलंग,मरुखान,प्रतीची,ब्रजेन आदि के माध्यम से इनके जीवन में होने वाले परिवर्तन को तो रचा ही है साथ ही सवाल भी खड़े किये हैं कि क्या ये परिवर्तन इस कलाकार समुदाय को सम्पूर्ण संरक्षण दे पायेंगे? साथ ही राजस्थानी गीतों और कथाओं से लेखक ने इसे सांस्कृतिक सुरभि प्रदान की है।
                           उपन्यास के केन्द्रीय चरित्र उदात्त और आदर्शवादी हैं, वहीँ समकालीन आर्थिक स्थितियों  के कारण भौतिकता की ओर ललचाई आँखों से देखते हुए पतनशील चरित्र भी हैं। चरित्रों की टकराहट से ही उपन्यासकार संस्कृति  की ऊँचाइयों को पाठकों तक पहुंचाते हैं। पूंजी में पगी आँखों और मानवी रिश्तों के लिए तरसती आँखों का तुलनात्मक विवरण सहज ही पाठक को झकझोर देता है। ये चरित्र ही हमें पावनता और कलुषता का अंतर भी बताते हैं। स्त्री-पुरुष के बीच सहज ही पनपी हेत-प्रीत और उसका रूपास पाठक के मन पर छा  जाता है। एक ऐसा मानवीय प्रेम जो सहज आकर्षण से,साहचर्य से पैदा होता है। यहाँ बहरी सौन्दर्य महत्वपूर्ण नहीं है, भीतरी राग तत्व महत्वपूर्ण है। इस राग तत्व से रचे गए ये चरित्र अशोक जमनानी की दृष्टि का ही विस्तार हैं। ' आज भी सब कुछ नष्ट नहीं हुआ है ' यह अशोक जमनानी के चरित्रों के केंद्र में है और इसीलिए यह उपन्यासकार उपदेश नहीं देता बल्कि सब कुछ अपने चरित्रों के माध्यम से कह देता है। साथ ही अशोक जमनानी के उपन्यास में कथा और देशकाल सतही जानकारियों पर आधारित नहीं हैं बल्कि वे इन स्थानों और परम्पराओं की पूरी पड़ताल करने के बाद ही उसे अपना उपजीव्य बनाते हैं।
                  थार की माड धरा के प्रतीक शब्द धोरे-टीले,खड़ताल,कमायचा,करहला,मोहरी,आंधी,चानंण पख,अंधार पख,किलकिलये कंवर, असपत,मुजरो आदि द्वारा वे खम्मा का परिवेश न केवल पाठकों को सौंपते हैं वरन उनके हिरदे में उतार देते हैं। यह उपन्यास सांस्कृतिक जीवन गाथा का दस्तावेज़ है। अशोक जमनानी विलुप्त हो रही जीवन पध्दतियों  और स्थानों की महत्ता के सामने आज की अंधी भौतिकता की दौड़ की विसंगतियों को रखते हैं और पाठक को पहचान के लिए विवश करते हैं कि उसके लिए क्या वरेण्य है? खम्मा में मालिक और सेवक के संबंधों में जो अपनापा,आधुनिक मानवीय दृष्टि और मिठास घोली है वह न केवल उनकी कल्पनाशील आँखों का कमाल है वरन यही वह दृष्टि  है जहाँ साहित्य यथार्थ का अतिक्रमण कर साहित्य बनता है।
    अशोक जमनानी को बधाई और 'घणा रंग'।  'रंग' हमारे राजस्थानी में उन्हें दिया जाता है जो श्रेष्ठ कार्य करते हैं। जैसे ....
        रंग रामा रंग लछिमणा रंग दशरथ रा कंवरांह
         लंका लूटी सोवणी  , आलीजा भंवरांह  


- डॉ आईदान सिंह भाटी





                             


 
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