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शनिवार, मई 25, 2013

निदा फ़ाज़ली जी के साथ एक दिन



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निदा फ़ाज़ली जी के साथ एक दिन 

हिन्दुस्तानी ज़बान के मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली साहब माधव ज्योति अलंकरण समारोह में हिस्सा लेने होशंगाबाद आये तो कार्यक्रम के अगले दिन मैंने उनसे घर आने की गुज़ारिश की जिसे उन्होंने इज़्ज़त बख़्श   दी। लम्बी बातचीत के खुशनुमा सिलसिले में उन्होंने कहा कि  हिन्दी-उर्दू बोली जातीं हैं तो एक ही भाषा होती हैं लेकिन लिखी जातीं हैं तो दो हो जातीं हैं। जो भी मुद्दा उठता निदा साहब बेबाकी से अपनी बात कहते बिना किसी की फ़िक्र के। जैसी उनकी उनकी शायरी है वैसी ही उनकी शख्सीयत भी है बेबाक लेकिन सरल। उनकी कमाल की साफगोई भी उसी शख्सीयत का एक हिस्सा है। मैंने फ़िल्म सरफ़रोश के मशहूर गीत ' होश वालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज़ है ' की प्रेरणा के बारे में पूछा तो उन्होंने कबीर के ' हमन हैं इश्क़ मस्ताना हमन को होशियारी क्या' का ज़िक्र किया। यह कहते हुए कि आज के दौर की एक बड़ी समस्या ज़रूरत से ज़्यादा होशियारी है। इसलिए  लिखा ' होश वालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज़ है'    भोजन के बाद मेरी छोटी बहन ने उनसे कहा कि उसे सैलाब की ग़ज़ल ' अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं ' बेहद पसंद है तो निदा साहब देर तक उसे गुनगुनाते रहे। फिर हमें इटारसी जाना था जहाँ से उन्हें ट्रेन पकडनी थी। रास्ते में उन्होंने पान की फ़र्माइश की और पान मुँह में घुलते ही अपनी मर्ज़ी से ... ग़ज़ल की फिर से शुरुआत हो गयी। ग़ज़ल पूरी हुई तो उन्होंने मेरे उपन्यास को अहम् की कहानी पूछी। मैंने संक्षेप में कहानी सुना दी तो उनका एक बिल्कुल नया मिज़ाज सामने आया उन्होंने गीता और ग़ालिब को जोड़ते हुए एक बहुत बेहतरीन तफ़्सीर पेश की। काश मैं उसे रिकॉर्ड कर पाता। बहुत-सी बातें होती रहीं फिर उनकी ट्रेन आयी तो लगा कि एक बेहतरीन दिन ख़त्म हो रहा है .... एक यादगार दिन बनकर  ... और हाँ मैंने पूछा कि आपके लिए साहित्य क्या है तो उन्होंने मुस्करा कर कहा ... ........ " आदमियों के जंगल में इंसान की तलाश ...... "  

- अशोक जमनानी       



 
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