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सोमवार, मई 27, 2013

एक मुलाक़ात मुनव्वर राणा जी के साथ





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एक मुलाक़ात मुनव्वर राणा जी के साथ

इन दिनों मेरे शहर का आलम ज़रा शायराना है। दो दिन पहले निदा फ़ाज़ली साहब साथ थे तो कल का दिन मुनव्वर राणा जैसे मशहूर शायर के साथ बीता। बातें तो इतनी हुईं कि सबको बयां करना अभी तो मुमकिन नहीं है  लेकिन उन्होंने अपने नामकरण का जो किस्सा सुनाया वो आपको सुना देता हूँ। उनका पूरा नाम है सय्यद मुनव्वर अली। जब शायर होने का इल्म जागा तो तखल्लुस लाज़मी हुआ सो हुज़ूर ने आतिश को इनायत बख्श दी और नाम हो गया सय्यद मुनव्वर अली आतिश। इसी दौरान उस्ताद शायर वाली आसी लखनवी से आपकी मुलाक़ात हुई। आपने शागिर्द बनने की गुज़ारिश की तो उन्होंने कहा कि अब उस्ताद-शागिर्द का दौर बीत गया क्योंकि आप शागिर्द होने का हक़ अदा करने में परेशान हो जाओगे साथ ही बहुत साफगोई दिखाते हुए उन्होंने ये भी कहा कि उन्हें नहीं लगता कि उस्ताद बनने लायक इल्म उनके पास है। लेकिन ये भी कह दिया कि जो कुछ उन्हें आता है वो ज़रूर सिखायेंगे। इतनी बात के बाद उन्होंने मुनव्वर साहब से नाम पूछा तो इन्होंने फ़क्र से कहा सय्यद मुनव्वर अली आतिश। बस उस्ताद साहब नाराज़ हो गए तुरंत कहा "ये आतिश-फातिश चूतियापंती वाले तखल्लुस हैं।" ( उस्ताद के किसी लफ्ज़ के लिए मुझे ज़िम्मेदार मत ठहराइयेगा )बस साहब आतिश तखल्लुस हट गया। इसी दौरान मुनव्वर साहब ने देखा कि कलकत्ता के बाज़ार में जहाँ उनका ट्रांसपोर्ट का कारोबार था और ट्रांसपोर्ट का नाम था - राणा ट्रांसपोर्ट लोग उनके नाम के साथ कोष्ठक में पहचान के लिए राणा लिख देते हैं। बस साहब मुनव्वर साहब ने बाकी सब छोड़ के लोगों के दिए नाम को क़ुबूल कर लिया और हिन्दुस्तान के  एक मेहबूब शायर को उसका तखल्लुस आम लोगों से मिल गया जिसे उन्होंने पूरी  इज़्ज़त दी है शायद इसी लिए उनकी शायरी आम लोगों के दिल तक पहुँचती है .... कहने के लिए बहुत सी बातें हैं जो फिर कभी। चलते-चलते उनसे कहा कि मेरे लिए कुछ लिख दीजिये उन्होंने एक कागज़ पर लिखा ...
छोटे भाई अशोक
बहुत दिनों से तुम्हें देखा नहीं
ये आँखों के लिए अच्छा नहीं

- अशोक जमनानी

 
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