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गुरुवार, जून 20, 2013

डर लगता है


डर लगता है 







डर लगता है

डर लगता है
ये सोचकर मुझे
जब थम रहीं होंगी
साँसें मेरी
बर्फीले पहाड़ों के बीच
बिखरी होंगी
अंजान लाशें हर ओर
बदन को छूते हुए मेरे
बह रही होगी कोई नदी
क्रुद्ध- विरुद्ध
उम्मीद का दम घुट गया होगा
बीते दिनों के साथ
तब मेरा आराध्य
कर रहा होगा विश्राम
प्रलय-नृत्य के बाद का
और मेरे मुल्क के मालिक
जुटा रहे होंगे चन्दा
मेरे ...
कफ़न के लिए ........

- अशोक जमनानी









 
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