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मंगलवार, अगस्त 27, 2013

कला में कंगाली का दौर

कला में कंगाली का दौर



'बूढ़ी डायरी' उपन्यास लिखने के लिए भेड़ाघाट के आस-पास बहुत वक़्त गुज़ारा था। कभी यह क्षेत्र कल्चुरि राजवंश की त्रिपुरी शाखा की राजधानी का हिस्सा था और उसी दौरान यहाँ की शिल्प कला ने अपने उच्चतम स्तर को भी छुआ। उस समय के शिल्पी दो भागों में विभक्त थे; राज शिल्पी जो शास्त्र का अनुसरण करते थे और लोक शिल्पी जो जन जीवन को मूर्तियों और प्रतिमाओं में उकेरते थे। वक़्त के साथ वो शिल्पी भी बीत गए लेकिन आज भी यहाँ शिल्प कला जीवित है। पर अब न तो शास्त्र का अनुसरण करने वाले राज शिल्पी हैं और न लोक जीवन को उकेरने वाले लोक शिल्पी। अब तो बस सांचे में ढली हुई किसी कृति की प्रतिकृतियां ही प्रतिकृतियां हैं। किया क्या जाये
आजकल प्रतिकृतियों का ही शोर है 
वैसे भी ये कला में कंगाली का दौर है …

- अशोक जमनानी


 
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