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गुरुवार, अगस्त 29, 2013

हे राजन

हे राजन

हे वयोवृद्ध राजन
असुरक्षित सीमाएँ
रिक्त कोष
भ्रष्ट तंत्र
सुप्त न्याय
लोभी आमात्य
लुटेरे  व्यवसायी
अपमानित नारी
भ्रमित युवा
विषाक्त भोजन रत बाल वृन्द
विकल-विफल जन  मानस
तुम्हारे ही 'सुकृत्य' हैं
हम धन्य हुए राजन
पर अब सर्व की विनय सुनो
अब मुक्त कर दो मुक्त होकर
देखो
मेरे शब्दों-मेरी लेखनी को भी
अच्छा नहीं लगता
तुम्हारे बाज़ारू समय में
हो जाना
पूरी तरह
बाज़ारू …….

- अशोक जमनानी


 
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